बड़ौत (बागपत)।
जैन संत अरुण मुनि ने कहा पड़ोसी, परिवार, समाज से जुड़ने पर ही परमात्मा से जुड़ा जा सकता है। कुछ समय पड़ोसी के लिए भी निकालों। स्वार्थ के लिए नहीं, परमार्थ के लिए धर्म करो।
उन्होंने जैन स्थानक नया बाजार में आयोजित धर्मसभा में कहा मनुष्य स्वार्थ के वशीभूत होकर धर्म करता है। परमार्थ के लिए कुछ नहीं करता। यदि आप पड़ोसी के काम नहीं आओगे तो पड़ोसी ही आपके काम क्यों आएगा। पड़ोसी की सुख सुविधाओं का ध्यान रखोंगे तो पड़ोसी भी तुम्हें दुखी नहीं देख सकेगा। उन्होंने कहा धर्म का जन्म मानव के लिए हुआ है और मानव का जन्म धर्म के लिए हुआ है। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। दोनों की कीमत एक-दूसरे से होती है। धर्म करने का अर्थ होता है, अच्छा व्यवहार करना। जब कोई व्यक्ति मरता है, उसकी अर्थी के पीछे चलने वाले व्यक्तियों की संख्या से व्यक्ति के अच्छा या बुरा होने का अनुमान लगाया जा सकता है। जब मनुष्य का जन्म होता है तो सबसे पहले माता-पिता मिलते हैं। फिर परिवार, फिर पड़ोस, फिर समाज मिलता है। इसके बाद परमात्मा की प्राप्ति होती है। प्रेम में अहिंसा होती है। मोक्ष मार्ग चाहते हो तो प्रेम की टेस्टिंग करो। इससे पहले अमन मुनि ने भी विचार रखे। इसमें जयप्रकाश, सोहन पाल, राजीव, बाबूराम, भोपाल जैन, हंस कुमार जैन, भूषण लाल, शेरू, शैलबाला, इंद्राणी, रेखा, उर्मिला, पूनम, अनुराधा आदि रहे।