बड़ौत (बागपत)।
जैन संत अरुण मुनि ने कहा कि कर्मों का अंत करने वाला ही अनंत बनता है। तन और त्याग का विशेष महत्व होता है।
वे सोमवार को जैन स्थानक शहर में पर्यूषण पर्व के तीसरे दिन बोल रहे थे। पर्यूषण पर्व जीवन में त्याग और तपस्या का संदेश लेकर आता है। इन दिनों में साधक विशेष रूप से अपने कदम आगे बढ़ाते हैं और वर्ष भर मनुष्य दूसरों पर उंगली उठाता है। आठ दिन तो कम से कम अपनी ओर उंगली करके देखना चाहिए। उन्होंने कहा कि दूसरों पर उंगली उठाना अतिक्रमण है, लेकिन अपनी ओर उंगली उठाना प्रतिक्रमण होता है। वे शांति के टुकड़े नहीं करते। त्याग और तपस्या का बिगुल कोई नहीं बजाता। मनुष्य जितनी ऊर्जा अतिक्रमण करने में लगाता है यदि उतनी ही प्रतिक्रमण करने में लगा ले तो बेड़ा पार हो जाएगा। उन्होंने कहा कि पर्व के 8 दिन जीवन यात्रा के दिन है। ये मोक्ष रूपी स्टेशन का आउटर नहीं बल्कि आभ्यांतर है। यह यात्रा बड़ी कमाल की है। एक किस्म से यह शिखर जी के तीर्थ की यात्रा है। इस अवसर पर टिल्लूचंद, अजय कुमार, भारत भूषण, अभय कुमार, दिनेश, हंस कुमार, दीपक, शैलबाला, इंद्राणी आदि उपस्थित रहे।
उधर, विहर्ष सभागार में धर्मसभा का शुभारंभ मंगलाचरण से अमित कुमार जैन ने किया। डॉ. श्रेयांस जैन ने सभी को युवा वर्ग को धर्म और गुरु सेवा में लगने का आह्वान किया। इस अवसर पर आचार्य सुंदर सागर महाराज ने कहा कि चार आराधनाएं चार गुणों को प्रकट करने वाली है। चौथे मोक्ष पुरूषार्थ को देने वाली है। चार शत्रुओं का नाश करने वाली है। सबसे बड़े शत्रु ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय व अंतराय है। उत्तम आराधना करने वाले तीन जीव है। धर्मसभा में मदन लाल, प्रमोद, अशोक, विनोद, अतुल आदि मौजूद रहे।