बड़ौत (बागपत)।
जैनाचार्य अरुण मुनि ने कहा दु:ख का मूल कारण आसक्ति है। इसे छोड़ने के बाद ही मुक्ति संभव है। मंगलवार को जैन स्थानक नई मंडी में आयोजित धर्मसभा में उन्होंने कहा किसी वस्तु, सहयोग हमेशा नहीं रहता। उसका वियोग भी होता है। जब किसी वस्तु के संयोग होने से उसके प्रति आसक्ति बढ़ जाती है, मगर वियोग होने पर दुख पहुंचता है। उन्होंने कहा जैन धर्म में ज्यादा कर्मकांड की आवश्यकता नहीं बल्कि उसकी वास्तविकता को समझना जरूरी है और वह है आसक्ति से दूर रहना। उन्होंने कहा साधु और संत के प्रवचन जादू की छड़ी के सामान होते हैं, जो हृदय में बैठा लेते हैं, तब चमत्कार होता है। केवल साधु वेश धारण करने, मुख पट्टी लेकर घूमने से कुछ नहीं होता। यदि मन में आसक्ति विद्यमान है तो कल्याण होगा। धर्मसभा में त्रिलोक चंद, मनीषा, जयप्रकाश, राजीव जैन, अनिल जैन, हंस कुमार जैन, दिनेश, शैल बाला, इंद्राणी, मधु, कमलेश, राखी जैन आदि रहे।