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गिनते रहिए नाम, खाने को नहीं मिलेंगे यह आम

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बागपत। आम की मिठास हर किसी को दीवाना बना रही है। बाजार से लेकर घरों और बागों तक आम के स्वाद का जिक्र है। दशहरी, चौसा, रटौल, गुलाब जामुन जैसी नामचीन किस्मों के विषय में तो सभी जानते हैं, लेकिन राष्ट्रीय फल की ऐसे भी प्रजातियां है, जिनके नाम तो सुने जाते हैं, लेकिन फल खाने को नहीं मिलते हैं।
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असल में आम की देशी, सिंदूरिया, सुरमेदानी, टेट्टन, रस का गोला, तंदूरिया, पाकीजा, रामकेला, काला जैसी सैकड़ों किस्म हैं जो या तो अब इस क्षेत्र में नहीं है या फिर इनके पेड़ों की संख्या बेहद सीमित हो गई है। बाजार में इन आमों की अधिक बिक्री नहीं होती है। ऐसे ही आमों में सुरखा, रसीला, अनारदाना, कच्चा गोला और मिर्चवाला भी शामिल हैं। सफेदा आम भी कम हुआ है। असली वजह यह है कि पुराने समय में किसान और बाग मालिक गांव और खेतों के नाम तक पर आम के नाम रख देते थे। आम का पौधा अगर किसी दूसरे गांव से लाकर लगाया गया है तो कई पीढ़ी तक यह पता होता था कि आम का यह पेड़ कहां से से लाया गया, लेकिन धीरे-धीरे बाग कटते गए और जमीनों को खेती के प्रयोग में लाया जाने लगा। ऐसे में बाग खत्म हो गए। इनके साथ ही खत्म हो गई आमों की प्रजातियां।


इसलिए मिर्चवाला और लंगड़ा
बागपत। रटौल में आम की नर्सरी चलाने वाले अबुल कलाम कहते हैं कि पुराने समय में नई-नई किस्में तैयार करने का शौक अधिक था। बाग मालिक और किसान स्थानीय स्तर पर नाम रख लेते थे। मिर्च की तरह लंबे आम का नाम मिर्चवाला रख दिया। जबकि लंगड़ा आम के पेड़ पर फल अधिक आता है। पेड़ झुक जाता है। पेड़ का साइज भी बड़ा नहीं होता, धीरे-धीरे इसका नाम ही लंगड़ा रख दिया गया।
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रटौल के आम की दूर तक धमक
बागपत। आम की जिक्र रटौल प्रजाति के बिना अधूरा ही है। रटौल गांव के नाम पर तैयार की गई रटौल प्रजाति को पेटेंट कराया। आम के शौकीनों के बीच रटौल आम के मिठास का जिक्र छिड़ता ही है। इसके अलावा रटौर बेनजीर, मकसूस, लज्जत रस समेत आम की 50 से अधिक किस्में ऐसी हैं, जो प्रसिद्ध है। रटौल का आम विदेशों में भी पसंद किया जाता है।

इनसेट
रटौल, बामनौली और बिजवाड़ा में बाग
बागपत। आम के बाग सिमट रहे हैं। अब केवल रटौल क्षेत्र के अलावा बामनौली और बिजवाड़ा में ही मुख्य रूप से आम के बाग रह गए हैं। बागों का कटान कर अधिकतर जमीन को खेती के तौर पर प्रयोग किया जा रहा है।


क्या कहते हैं किसान
बागपत। बामनौली के किसान सरदार सिंह का कहना है कि पहले अपनी-अपनी ट्यूबवेल पर किसान फलदार पेड़ लगाते थे। इन पेड़ों से छांव और फल दोनों मिलते थे। दो दशक पहले तक किसान का अधिकतर समय खेत में गुजरता था, लेकिन वर्तमान में खुद किसान ही ट्यूबवेल पर समय कम बिताते हैं। ऐसे में पेड़ों के देखभाल कैसे हो। यही वजह है कि वर्तमान में बाजार से खरीदकर लोग फल खा रहे हैं, लेकिन खुद के खेत से कम फल प्रयोग किए जाते हैं।
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