37 साल चकबंदी, फिर भी नहीं मिली जमीन
बागपत। ऊंचे टीलों, पुराने मंदिरों और भरतपुर रियासत में खास दखल की वजह से पहचान रखने वाला बामनौली गांव अपने हक के लिए सिसक रहा है। 14 अगस्त 1981 को उम्मीदों के साथ शुरू हुई चकबंदी नासूर बन गई है। पीढ़ियां बदल गई, लेकिन जमीनों पर कब्जे नहीं मिले। हवाई चक काट दिए गए, लेकिन कब्जा परिवर्तन नहीं हुआ। एक या दो नहीं बल्कि गांव के सैंकड़ों किसान ऐसे हैं, जिनकी जमीन ही गुम हो चुकी है। लोग चीखते हैं, चिल्लाते हैं। लखनऊ तक अंजान नहीं है, जांच कमेटियां बनीं। दोषी अधिकारियों और कर्मचारियों के नाम भी सामने आ गए। लेकिन कार्रवाई कौन करेगा, कब होगी और किस पर होगी कोई नहीं जानता। पिछले साल आठ बीघे के किसान कृष्णपाल ने आत्महत्या कर ली, लेकिन इंसाफ नहीं मिला। इसी माह दो बार किसान टॉवर चढ़ चुके हैं। लेकिन समाधान नहीं हुआ। गुस्से में बड़ौत से मुजफ्फरनगर जाने वाला रास्ता बंद कर दिया जाता है, लेकिन सिस्टम नहीं सुनता।
-----------------------
कब्जा परिवर्तन किया तो मुआवजा क्यों नहीं
बागपत। पूर्व प्रधान महिपाल सिंह कहते हैं कि प्रावधान है कि अगर चकबंदी विभाग कब्जा परिवर्तन कर रहा है तो किसानों को खड़ी फसल का मुआवजा दिया जाएगा। लेकिन एक भी किसान को 37 साल में मुआवजा नहीं दिया गया। चकबंदी विभाग के पास गांव का रिकॉर्ड ही नहीं है। कौन सी जमीन कहां है, किसकी ट्यूबवैल कौन सी है, किसकी जमीन पर कितने पेड़ खड़े हैं। फाइलों में कब्जा परिवर्तन किया गया है। जमीन की बंदरबांट की गई, जिसकी वजह से किसान खाली हाथ खड़े हैं।
-----------------------
16 हजार बीघा जमीन, 18 सौ किसान
बागपत। बामनौली की करीब 16 हजार बीघा जमीन पर चकबंदी होनी थी। इसमें 18 सौ किसान प्रभावित हुए। लेकिन हवाई चक काटने पर अधूरे कब्जा परिवर्तन के कारण किसान पीड़ित हैं। बार-बार आश्वासन दिए जाते हैं, लेकिन किसानों की समस्या अनसुनी की जा रही है।
-----------------------
अदालत में चकबंदी के 417 मुकदमे
बागपत। चकबंदी अधिकारी, बंदोबस्त चकबंदी अधिकारी और उप संचालक चकबंदी की अदालत में 417 मुकदमे पेंडिंग पड़े हैं। सीओ चकबंदी बड़ौत के यहां 203 मुकदमे हैं। जबकि चकबंदी अधिकारी बागपत के यहां 149 मुकदमे लंबित हैं।
-----------------------
इस तरह बामनौली में लुटते रहे किसान
बागपत। बामनौली गांव में 1981 से चकबंदी प्रक्रिया शुरू की गई थी। नाराज किसान कोर्ट चले गए। इसके बाद फिर 1989 में चक काटे गए, वह भी गलत तरीके से काटे गए थे। उसके बाद 1991 में चक काटे गए और धारा 20 लगा दी गई। उस समय न्यायालय के आदेश पर विजिलेंस की टीम ने इसकी जांच की तो खामियां पाई गई। किसान राजेंद्र सिंह, राजबीर सिंह, ज्ञानेंद्र, सतपाल सिंह, महेंद्र सिंह और जयपाल सिंह का आरोप है कि चकबंदी प्राधिकारियों ने चकबंदी में व्याप्त खामियों को दूर किए बिना ही फिर से चक काट दिए। जिसके विरुद्ध फिर से किसान कोर्ट चले गए। किसानों ने यह भी आरोप लगाया कि 2016 में चकबंदी अधिकारियों ने फर्जी दस्तावेज न्यायालय में पेश कर चकबंदी कराने के आदेश जारी करा लिए और कोर्ट के आदेश पर चकबंदी कराई गई।
--------------------------
रंगे हाथ पकड़ा गया था लेखपाल
बागपत। बामनौली गांव में पिछले दिनों ही लेखपाल को विजिलेंस की टीम ने रिश्वत लेते रंगे हाथ पकड़ लिया था। इसके अलावा शासन स्तर से कई अधिकारियों पर कार्रवाई हो चुकी है, लेकिन सिस्टम सुधरता नहीं दिख रहा है।
--------------------------
निरपुड़ा ने हाथ खींचे, बामनौली और बरनावा में चकबंदी
बागपत। चकबंदी प्रक्रिया बामनौली के अलावा इस समय बरनावा में चल रही है। किसान बेहद परेशान हैं। किसानों का कहना है कि पूरी प्रक्रिया गलत है, जांच के लिए हाई लेवल कमेटी बना दी जानी चाहिए। पिछले दिनों निरपुड़ा गांव के लोगों ने एक होकर चकबंदी कैंसिल करा ली। लेकिन बरनावा और बामनौली में विवाद चल रहा है।