बागपत। मुजफ्फरनगर दंगे की दर्द भरी दास्तां को पांच साल बीत गए। पीड़ित परिवारों की आंखों में आज भी आंसू हैं। आठ सितंबर की रात में वाजिदपुर गांव के धार्मिक स्थल में फायरिंग हुई। 15 साल के शोएब की मौके पर ही मौत हो गई थी। जबकि एक घायल ने बाद में दम तोड़ा। गांव में आज भी दंगे का दर्द देखा जा सकता है। काठा और किरठल गांव में दंगे का असर देखने को मिला। मुजफ्फरनगर और शामली के कई परिवार बागपत के पुराना कसबे में रह रहे हैं। कहते हैं कि वह किसी तरह जान बचाकर यहां तक पहुंचे थे। अपना गांव छोड़कर गए लोगों में कुछ वापस भी लौटे हैं, लेकिन इनके गम अभी तक भी कम नहीं हुए हैं।
वाजिदपुर में शोएब और इकबाल की हत्या
बड़ौत से सटे वाजिदपुर गांव में आठ सितंबर की रात में खून-खराबा हुआ । किशोर शोएब की मौके पर ही मौत हो गई , जबकि गंभीर घायल इकबाल ने अस्पताल में दम तोड़ा । धार्मिक स्थल में आगजनी की गई। शोएब का परिवार गांव से पलायन कर गया और फिर गांव नहीं लौटा। गांव से गए लोग लौटने लगे हैं। लेकिन अभी भी गांव में दंगे को याद कर गम का माहौल बन जाता है। ग्रामीण कहते हैं कि वह अब कभी भाईचारा नहीं टूटने देंगे।
बामनौली में कर दी गई थी अख्तरी की हत्या
बागपत। दोघट क्षेत्र के बामनौली गांव में अख्तरी नाम की महिला की पांच सितंबर को हत्या कर दी गई थी। परिवार के लोग गांव छोड़ गए। अख्तरी का मामला कोर्ट में विचाराधीन है। मामले में सात लोग नामजद किए गए थे। ग्रामीण कहते हैं कि इस तरह की घटना गलत है। अपने गांव में वह फिर कभी झगड़ा नहीं होने देंगे।
किरठल में मिले कारतूस, कहां गया मासूम
बागपत के किरठल गांव से दंगे के दौरान एके 47 के कारतूस बरामद हुए थे। यह कारतूस कहां से आए और किरठल तक कैसे पहुंचे यह अब तक राज ही बना हुआ है। पांच साल बाद भी कारतूस के राज से पर्दा नहीं हट सका है। इसके अलावा बागपत के सुभाष गेट के पास से दंगे के दौरान एक मासूम लापता हो गया था, जिसका आज तक कोई सुराग नहीं लग सका है। पीड़ित परिवार पुलिस से गुहार लगाकर थक चुका है।
हमसे पूछिए अपना घर छोड़ने का दर्द
मुजफ्फरनगर के भौरा कलां थाना क्षेत्र के गांव मोहम्मदपुर राय सिंह की रहने वाली महिला रूबी कहती है कि दंगे में पूरा परिवार बेघर हो गया। आज भी याद है कि सात सितंबर 2013 की रात में उसकी सास हसीना और ससुर मेहरदीन ने कहा था दंगा भड़क गया है, गांव छोड़ना पड़ेगा। गांव में एक व्यक्ति की हत्या कर दी गई थी। बच्चे बिलख उठे थे। महिलाओं का रो रोकर बुरा हाल था। किसी तरह पहले बुढ़ाना, फिर बड़ौत और बाद में बागपत तक पहुंचे। रूबी कहती है कि वह दंगे को भूल जाना चाहते हैं, किसी पर भी ऐसी आफत न टूटे। वह बुरे सपने की तरह है।