बड़ौत (बागपत)। ओपी जिंदल विश्वविद्यालय बाहलगढ़, सोनीपत के 45 छात्र-छात्राओं का दल रविवार को सिनौली उत्खनन स्थल पर पहुंचा, जहां पर उन्हें एएसआई लालकिला संस्थान के निदेशक ने उत्खनन से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारियां दी।
पांच मार्च को दिल्ली विश्वविद्यालय से संबद्ध कॉलेज के 80 छात्र-छात्राओं का दल पहले बरनावा व बाद में सिनौली उत्खनन स्थल पर पहुंचा। जहां उन्होंने उत्खनन संबंधित जानकारियां जुटाईं। इसके उपरांत छात्रों का दल शहजाद राय शोध संस्थान के निदेशक डॉ. अमित राय जैन ने जैन स्थानक मंडी में लगी पुरावशेषों की प्रदर्शनी का अवलोकन करने गया । अमित राय जैन ने उन्हें बताया कि बागपत व उनके शोध संस्थान में दुर्लभ ताम्र तत्व व अन्य पुरावशेष उपलब्ध हैं। प्रदर्शनी में ताम्र युगीन शस्त्र और आभूषण, पांच हजार वर्ष पुराने टेराकोटा की आकृतियां मातृ देवी मृण मूर्ति व अन्य पुरावेशेषों का अध्ययन किया।
वहीं रविवार को ओपी जिंदल यूनिवर्सिटी बाहलगढ़, सोनीपत का 45 छात्र-छात्राओं का दल सिनौली पहुंचा। यहां एएसआई लालकिला संस्थान के निदेशक डॉ. संजय मंजुल ने उन्हें उत्खनन संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी दी और बताया कि अब तक उत्खनन के दौरान ईंटों की विशाल दीवार, दुर्लभ पॉट्री के साथ-साथ एक ट्रेंच से महिला कंकाल प्राप्त हुआ, इसके कानों से स्वर्ण आभूषण भी प्राप्त हुए हैं। इस महिला को बाहर निकालते हुए टीम को एक शाही ताबूत भी मिला। इसके अलावा यहां पर जानवरों के जबडे़, धनुषनुमा आकृति भी मिल चुकी है। इसके अलावा पिछले एक माह से यहां पर राजेंद्र व श्रीराम के खेत में प्राचीन दीवार भी निकल चुकी है, जबकि श्रीराम के खेत में एक कंकाल व दो भट्ठियां शोधार्थियों को कई दिन से दिखाई दे रहा है।
वर्ष 2005 में शुरू हुआ था उत्खनन कार्य
बड़ौत। वर्ष 2005 में सिनौली में वरिष्ठ पुरातत्वविद डॉ. डीवी शर्मा के निर्देशन में एएसआई द्वारा प्रथम चरण की खुदाई कराई। यहां 177 मानव कंकाल, सोने के कंगन, मनके, तलवार के साथ-साथ एक विशाल शवाधान केंद्र की पुष्टि हुई । इसके बाद 15 फरवरी 2018 को सिनौली साइट पर एएसआई लालकिला संस्थान के निर्देशन में साढ़े तीन माह तक उत्खनन हुआ। आठ मानव कंकाल, तीन एंटीना सोर्ड यानी तलवारें, काफी संख्या में मृदभांड, विभिन्न दुर्लभ पत्थरों के मनके, सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्राप्ति के रूप मेें पांच हजार साल प्राचीन मानव योद्धाओं के तीन ताबूत तांबे से सुसज्जित, भारतीय योद्धाओं के तीन रथ प्राप्त हुए, जो इतिहास की दुर्लभतम घटना साबित हुई, जिन्हें पुरातत्व विभाग दिल्ली में सुरक्षित जगह रखा गया है।