जयंत चौधरी को विरासत सौंपने की तैयारी
बागपत। रालोद अध्यक्ष चौधरी अजित सिंह का मुजफ्फरनगर से चुनाव लड़ना लगभग तय है। लेकिन सीट बदलने के फैसले के पीछे तीन खास वजह हैं। पहली दंगे से बिगड़े जाट-मुस्लिम समीकरण को फिर से मजबूत कर सपा, बसपा और रालोद गठबंधन को पूरे पश्चिम उत्तर प्रदेश में लाभ पहुंचाना, दूसरी बागपत की विरासत जयंत चौधरी को सौंपने और तीसरी 48 साल पहले मुजफ्फरनगर में पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय चौधरी चरण सिंह को मिली हार की कसक को मिटाने की चाहत। इन प्रमुख वजहों से इस बार चौधरी अजित सिंह मुजफ्फरनगर से चुनाव के मैदान में होंगे। रालोद की बड़ी सियासी चाल पर भाजपा के रणनीतिकार भी मंथन में जुटे हैं।
ऐसा पहली बार होगा कि रालोद अध्यक्ष चौधरी अजित सिंह बागपत के बजाए किसी दूसरी सीट से मैदान में उतरेंगे। मुजफ्फरनगर दंगे के बाद रालोद को साल 2014 के लोकसभा चुनाव और 2017 के विधानसभा चुनाव से अब तक वजूद की लड़ाई लड़नी पड़ रही है। कैराना उपचुनाव में जाट मतों को मुस्लिम प्रत्याशी पर शिफ्ट कराकर रालोद उपाध्यक्ष जयंत चौधरी सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के साथ समन्वय बनाने में कामयाब रहे। लोकसभा चुनाव में भी सीटों के गणित के बजाए जयंत चौधरी ने गठबंधन और भविष्य की राजनीति को तरजीह दी है। मुजफ्फरनगर सीट से चौधरी अजित सिंह को चुनाव लड़ाना बड़ा सियासी फैसला है। भाजपा के सामने गठबंधन में चौधरी अजित सिंह ही ऐसे उम्मीदवार हैं, जो जाटों के अलावा मुस्लिम और दलित वोटों को रालोद के खाते में शिफ्ट कराने का वजूद रखते हैं। सपा, बसपा और रालोद का गठबंधन पश्चिम उत्तर प्रदेश की सभी सीटों पर इसी समीकरण का संदेश देना चाहता है। दूसरी वजह बागपत लोकसभा की विरासत जयंत चौधरी को सौंपना भी है। बहुत संभव है कि अजित सिंह का यह आखिरी चुनाव है, इसके बाद वह चुनाव नहीं लड़ेंगे। बागपत से चौधरी चरण सिंह ने 1977 से 1984 तक लोकसभा चुनाव जीते। साल 1989 में चौधरी अजित सिंह यहां से चुनाव मैदान में उतरे। साल 1998 और 2014 के चुनाव को छोड़ दें तो अजित सिंह यहां अजेय रहे। बागपत से इस बार जयंत चौधरी को चुनाव लड़ाकर उन्हें सियासत की विरासत सौंपने की तैयारी है।
तीसरी वजह मुजफ्फरनगर से जुड़ी एक बड़ी कसक भी है। चौधरी चरण सिंह ने पहली बार साल 1971 में लोकसभा का चुनाव मुजफ्फरनगर सीट से ही लड़ा था। लेकिन वह सीपीआई के ठाकुर विजयपाल सिंह से हार गए थे। बड़े चौधरी की बड़ी सियासत के बावजूद सियासी गलियारों में रह-रहकर इस हार की चर्चा भी उठती रहती है। कहीं न कहीं 48 बाद इसी कसक को मिटाने के लिए भी चौधरी अजित सिंह इस बार फिर से मुजफ्फरनगर की जनता के बीच होंगे। भाजपा भी गठबंधन की इस चाल से अंजान नहीं है। रणनीतिकारों ने मुजफ्फरनगर को लेकर खास तैयारियां भी शुरू कर दी है।
भाजपा के पास नहीं हुकुम सिंह जैसा नेता
बागपत। दिवंगत कैराना सांसद हुकुम सिंह के निधन के बाद भाजपा के पास उनका कोई विकल्प नहीं है। हुकुम सिंह पहली बार सांसद जरूर कैराना से बनें थे, लेकिन विधानसभा चुनाव का उनके पास लंबा अनुभव था। मुजफ्फरनगर, कैराना, सहारनपुर, मेरठ, बिजनौर और बागपत समेत तमाम सीटों पर सभी वर्गों और यहां तक की पक्ष और विपक्ष के नेताओं के बीच उनकी बेहतर छवि थी। गुर्जर, ठाकुर और जाट मतों को भी वह प्रभावित करते थे। भाजपा के पास उनका कोई विकल्प नजर नहीं आ रहा है, इसी का खामियाजा कैराना के उपचुनाव में पार्टी को भुगतना पड़ा। बदले माहौल में कैराना सीट पर भाजपा की मुश्किल यही है कि हुकुम सिंह जैसा नेता उनके पास नहीं है।