बड़ौत(बागपत)। जैन संत अरुण मुनि ने कहा कि जिसकी भाषा ठीक नहीं होगी उसका मन भी मैला हो जाता है। ठीक उसी प्रकार, जिस प्रकार नग्न शरीर पर गहने सजाने का कोई औचित्य नहीं होता। गहने भी कपड़ों से ही सुशोभित होते हैं।
वे मंगलवार को जैन स्थानक नया बाजार में धर्मसभा में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि मैला कपड़ा धोए बिना साफ नहीं हो सकता। उससे बेहतर होगा कि कपड़े को मैला ही न होना दे। मुनियों की भाषा दुरूस्त होती है तो उनका मन भी स्वच्छ पानी के समान होता है। यदि मुनि बनकर भी भाषा पर नियंत्रण नहीं किया तो सातवीं नर्क का बंध हो जाता है। उन्होंने कहा कि जब मन में समता भाव होगा तो मन स्वयं ही प्रसन्न हो जाएगा। भगवान से यदि कुछ मांगना है तो बस आरोग्यता का वरदान मांगो। शरीर जब अरोग्य होगा तो मन पूर्णत: प्रसन्न होगा। जो निर्धन होता है। वह कदम-कदम पर दुखी रहता है। खुद के अलावा वह दूसरों को भी दुखी करता है। उन्होंने कहा कि आज का मनुष्य समाज को, परिवार को, मकान को तथा शरीर को संभालने में जुटा है। मन को संभालने की आवश्यकता नहीं समझता। इससे पूर्व आगम मुनि ने भी विचार रखे। धर्मसभा में डीके जैन, विनोद जैन, प्रवीण जैन, हंस कुमारजैन, अतुल जैन, रमेश वर्मा, कालू जैन, शैलबाला, इंद्राणी जैन, रेखा जैन, मोनिका जैन आदि उपस्थित रहे।