नाट्य संस्था सूत्रधार की ओर से मडय़ा स्थित शारदा टॉकिज में आयोजित 12वें आजमगढ़ रंग महोत्सव के दूसरे दिन शनिवार को रंग-संगीत में बेगूसराय (बिहार) के शशिकांत कुमार और साथियों ने विभिन्न विधाओं के गीतों की प्रस्तुति कर सभी का मनमोह लिया। दूसरे सत्र में मोहन राकेश कृत आषाढ़ का एक दिन का मंचन हुआ।
नाट्य संस्था सूत्रधार संस्थान आजमगढ़ की ओर से आयोजित नाट्य समारोह आरंगम-2017 की दूसरी संध्या का शुभारंभ चीफ सेक्रेटरी रेवेन्यू बिहार त्रिपुरारी शरण, संगम पांडेय व मुकेश भारद्वाज ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया। महोत्सव के दूसरे दिन प्रथम सत्र में रंगसंगीत के तहत बेगूसराय (बिहार) के शशिकांत कुमार व साथी ने गीतों से सभी का मनमोह लिया। दूसरे सत्र में मोहन राकेश कृत आषाढ़ का एक दिन का मंचन अभिषेक पंडित के निर्देशन में किया गया। नाटक में नायिका मल्लिका (ममता पंडित) समर्पित भाव से कालिदास से प्रेम ही नहीं करती वरन् उसे अपने जीवन में महान होते देखना जाती है। इसके लिए उसे अपना सर्वस्व देकर केवल प्रतीक्षा करनी पड़ती है।
जबकि मल्लिका कालिदास के लिए सिर्फ प्रेरणा मात्र हैं, उसे मल्लिका प्रकृति एवं औदात्य का प्रतीक लगती है। इन सबके बीच मल्लिका की मां अंबिका (डा. अलका सिंह) का इन दोनों के प्रेम के प्रति नकारात्मक भाव जीवन के अपने कटु अनुभवों को प्रकट करता है। लेकिन मल्लिका अपने उद्देश्य के प्रति प्रंतिबद्ध है। इस बीच उज्जैनी के राजा, कालिदास को राजधानी आमंत्रित करते हैं। जहां उसे राज्य कवि का आसन प्राप्त होता है। वहां जाकर कालिदास अपने रचनाकर्म व भोग विलास में तल्लीन हो जाते हैं। वह राज्य कन्या प्रियंगुमंजरी (नेहा राय) से विवाह कर काश्मीर का शासन भार संभालन लेते हैं।
इस बीच मल्लिका अपने जीवन और भावना के साथ संघर्ष करते हुए लगारतार कालिदास की प्रतिक्षा करती रहती है। एक-एक दिन उसके जीवन में एक नई समस्या व विशाद को जन्म देते हैं। इस बीच अंबिका की मौत हो जाती है और मल्लिका नितांत अकेली, मल्लिका धीरे-धीरे ग्राम पुरुष विलोम (श्रवण सिंह राणा) पर निर्भर हो जाती है। लेकिन नियति उसे इससे कही ज्यादा आगे तक, खींच ले जाती है। नाटक में अंगद निषाद, रवि चौरसिया, संजय, संदीप, अरविंद चौरसिया ने अपने शानदार अभिनय से लोगों की तालियां बंटोरी। नाटक में सुग्रीव विश्वकर्मा की सेट परिकल्पना और रणजीत कुमार की प्रकाश परिकल्पना सराहनीय रही।