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कोई तो सूद चुकाए, कोई तो जिम्मा ले...

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कैफी आजमी। - फोटो : AZAMGARH
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मेजवां। ‘‘कोई तो सूद चुकाए, कोई तो जिम्मा ले, उस इंकलाब का जो आज तक उधार सा है’’ ये पंक्तियां उर्दू के मशहूर शायर और फ़िल्म गीतकार दिवंगत कैफी आजमी की है। जिन्होंने अपनी रचनाओं में आजीवन इंकलाब की वकालत की। गुरुवार को शायर कैफी आजमी की जयंती सादगी पूर्वक उनके पैतृक आवास फतेह मंजिल में मनाई जाएगी।
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कैफी का बचपन का नाम सैयद अतहर हुसैन रिजवी था। उनकी मां का नाम हफीजुन बीवी और पिता का नाम फतेह हुसैन था। आज भी कैफी का पुश्तैनी घर अपनी यादों को समेटे हुए है। कैफी आजमी प्रगतिशील शायर होने के नाते उनके दिल में हमेशा गांव के विकास के लिए जिज्ञासा उत्पन्न हुआ करती थी। जिसके चलते वे व्हील चेयर पर बैठकर हर एक कार्यों को बखूबी अंजाम देते थे। 1980-81 के दशक में जब वे दूसरी बार मुंबई से मेजवां आए तो यही के होकर रह गए। आठ फरवरी 1972 को कैफी को मुंबई में फालिज का असर हुआ तो उन्हें अपना पैतृक गांव मेजवां याद आने लगा। इलाज के बाद जब उनके स्वास्थ्य में सुधार हुआ तो वे चल पड़े अपने पैतृक गांव की ओर। आजमगढ़ जिले के फूलपुर तहसील के पास मेजवां गांव के एक जमीदार परिवार में उनका जन्म 14 जनवरी 1919 में हुआ था। उन्होंने 14 वर्ष की उम्र में पहली ग़जल लिख कर शायरी की दुनिया में कदम रखा था। उन्होंने वर्ष 1943 में मशहूर नाट्य कर्मी शौकत से निकाह किया। शौकत ने कैफी का हर मोड़ पर साथ दिया। जब भी कैफी साहब गांव आते उनके साथ उनकी खिदमत के लिए शौकत जरूर आती थी। वर्ष 1948 में शहीद लतीफ की बुजदिल कैफी आजमी की पहली फ़िल्म थी। इसके बाद शमा, कागज के फूल, हकीकत, पाकीजा, शोला और शबनम, अर्थ, अनुपमा, हंसते जख्म, मंथन, हीर रांझा, शगुन, हिंदुस्तान की कसम, नौनिहाल, नसीब, तमन्ना, फिर तेरी कहानी याद आयी सहित कई फिल्मों में उन्होने गीत लिखे। उन्होंने फिल्मों को अपना कैरियर नहीं बनाया। क्योंकि उन्हें अमीरी गरीबी की दीवार को गिराना था। इसके लिए उन्होंने पूरा जीवन समाज सुधार में लगा दिया। यही वजह रही है कि कैफी आजमी ने फिल्मी दुनिया में जो स्थान बनाया था वह आज भी मील का पत्थर साबित होता है। उन्होंने केवल कविता के माध्यम से नहीं बल्कि अपने व्यवहारिक जीवन से भी मानवता का पाठ पढ़ाया। गांव में रहकर उन्होंने विकास के कई कार्य किए हैं। जो लोगों के रोजगार का जरिया बन गया। कैफी साहब की बदौलत उनके पैतृक गांव मेजवां में वह हर एक सुख सुविधा है जो एक आदर्श गांव में होती है। जिले में कैफी साहब की स्मृतियों को याद करते हुए ग्राम कोनी निवासी हाईकोर्ट अधिवक्ता अकील अहमद कहते हैं कि कैफी साहब जमींदार घराने के होने के बावजूद गरीबों के दुख दर्द को महसूस करते थे। जो बाद में उनकी शायरी का हिस्सा बन गया।
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