आजमगढ़। रोडवेज बसें मंजिल तक पहुंचा दें यही काफी है। उनके फर्स्ट एड बाक्स के भरोसे न रहें। सीट टूटी हो या छत टपकती हो, इस बात की शिकायत करने या रोडवेज को सेवा बेहतर बनाने का सुझाव देने की तो सोचिए भी मत। उत्तर प्रदेश परिवहन निगम की सेवाओं का हाल आजकल कुछ ऐसा ही है।
आजमगढ़ रीजन के सात जिलों के डिपो से 408 बसों का संचालन होता है। इनमें से आधी बसों की हालत खस्ता है। किसी की सीट टूटी हुई है तो किसी की खिड़की। कई बसों की छत बारिश में टपकने लगी है। हर बस में फर्स्ट एड और सुझाव व शिकायत पुस्तिका की पेटिकाएं हैं लेकिन उनमें न दवा रहती है और न ही शिकायत पुस्तिका। बसों में आग लगने पर भी सुरक्षा के इंतजाम नहीं है। अग्निशमन उपकरण या तो गायब हैं या हैं तो जंग लगे हुए। उनमें से तमाम उपकरणों की तो मियाद भी बीत चुकी है। कोविड गाइड लाइन के तहत बसों में सैनिटाइजर होना चाहिए और हर यात्री मास्क लगाए हो लेकिन इसका भी ध्यान नहीं रखा जाता है। न ही थर्मल स्कैनिंग की जाती है। यात्रियों को मजबूरी में रोडवेज की इसी तरह की बसों में सफर करना पड़ता है। रोडवेज के गैराज में 10 से अधिक बसें मरम्मत के लिए खड़ी रहती हैं। किसी के चक्के खराब होते हैं तो किसी की सीट गायब। हालांकि सहायक क्षेत्रीय प्रबंधक ललित कुमार श्रीवास्तव का कहना है कि ज्यादातर बसों में सभी यात्री सुविधाएं उपलब्ध हैं। कुछ बसें ऐसी होंगी जिनमें फर्स्ट एड बॉक्स या सुझाव पेटिका नहीं होगी।