आजाद हिंद फौज में नेता जी सुभाषचंद्र बोस के अंगरक्षक व चालक रहे कर्नल निजामुद्दीन में 117 वर्ष की अवस्था में भी राष्ट्रप्रेम को जज्बा बरकरार है। नेता जी के साथ बीते समय और घटनाओं को याद कर उनकी आंखें सजल हो गईं। उन्होंने कहा कि नेताजी को बचाने के प्रयास में उनकी पीठ में तीन गोलियां लगी थीं। उनकी अचूक निशानेबाजी से प्रसन्न होकर हिटलर ने उन्हें एक गन दी थी।
बातचीत के दौरान मुबारकपुर क्षेत्र के ढ़कवा गांव निवासी निजामुद्दीन को नेताजी की 23 जनवरी को जयंती के बारे में बताया गया तो वे भावुक हो उठे। उनके साथ बिताए पलों को याद करते हुए बताया कि बर्मा के घने जंगल में वह और नेता जी साथ थे। नेता जी ने मुंह पोंछने के लिए जेब से रुमाल निकाली तो गिर गई।
जैसे ही मैं रुमाल उठाने के लिए उठे तो झाड़ी से नेता को लक्ष्य करके तीन गोलियां चलीं। मैं नेताजी के सामने आ गए और तीनों गोलियां उनकी पीठ में लगी। जबावी फायरिंग में झाड़ी में छिपे अंग्रेज दुश्मन की मौत हो गई। फिर वह बेहोश हो गए। जब होश आया तो नेताजी को अपने ऊपर झुका हुआ पाया। उसी समय नेताजी ने उन्हें कर्नल कहकर पुकारा था। उन्होंने नेताजी से कहा था कि मुझे पद नहीं मेरा देश और आपका साथ प्यारा है। आजाद हिंद फौज के क्रांतिकारी सिपाही डा. लक्ष्मी सहगल ने बंदूक की संगीन गर्म करके पीठ पर लगी गोलियों को निकाला।
इन गोलियों के निशान मेरी पीठ पर आज भी मौजूद हैं। बताया कि बर्मा के जंगल में हम अंग्रेजों के खिलाफ जंग लड़ने के लिए सुरंग बनाकर उसमें छिपते थे और सुरंग से निकलने कई कई रास्ते हुआ करते थे। कहा कि मेरा अचूक निशाने से प्रभावित होकर के हिटलर ने मुझे एक गन भेंट की थी। गन की हथेली हाथी के दांत से निर्मित थी, जिस पर बैल के सींग के निशान खुदे थे। इस गन को 15 अगस्त व 26 जनवरी पर निकाल कर फायर किया करता था। कर्नल के पुत्र मुहम्मद अकरम ने सवाल किया कि देश के लिए अपना सब कुछ कुर्बान कर देने वाले कर्नल निजामुद्दीन क्या भारत रत्न के हकदार नहीं हैं।