आजमगढ़ जिले में रंगमंच का करीब 75 वर्ष पुराना गौरवशाली इतिहास रहा है लेकिन उपेक्षा और संसाधन के अभाव में जिले में रंगमंच को प्रसिद्ध हासिल नहीं हो सकी। अब तो यहां का रंगमंच आर्थिक रूप से समृद्धिशाली है, फिर भी साधन और संसाधन इसकी प्रसिद्धि में आड़े आते हैं। हाल में ही जजी मैदान में संपन्न हुए देशज से जिले के कलाकारों को आस जरूर बंधी है कि आने वाले दिन उनका और उनके रंगमंच का बेहतर होगा।
बताते चले जिले में रंगमंच की नींव वर्ष 1936 में पड़ी। इसके बाद कई संस्थाएं रंगमंच के लिए काम करना शुरू कीं। इसमें नवनाट्यम, समानांतर आदि शामिल थी। संस्था के जरिए लोग शौकिया तौर से रंगमंच से जुड़े, उस दौर के प्रसिद्ध रंगकर्मियों में शंकर पंाडेय, अकुरा, ईएल दास, शमसुल हुदा खां 'डैडी आदि लोग थे। कहा जाता है कि शौकिया तौर से रंगमंच से जुड़े लोगों को स्थानीय जनता ने उत्साहित किया। इसका परिणाम रहा कि उस दौर में रंगमंच को एक आयाम मिला। इस दौरान तत्कालीन जिलाधिकारी कटारा ने कला भवन की नींव डालकर पत्नी के नाम से कुसुम संगीत महाविद्यालय खोलवाएं।
कुसुम का लगाव रंगमंच से था लेकिन बाद में धनाभाव सहित अन्य समस्याओं के आने के कारण यह मंच सूना पड़ गया लेकिन 1990 के दशक में स्व. हरिकमल के प्रयास से पुन: एक बार जिले के रंगमंच पुनर्जीवित हुआ तो आज तक अनवरत जारी है। वर्तमान समय के रंगकर्मी अभिषेक पंडित, सुनील दत्त विश्वकर्मा, संतोष श्रीवास्तव, राघवेंद्र मिश्र आदि हरिकमल के प्रयास की देन हैं, जो इस मंच को कभी सुना नहीं होने देते। इसका परिणाम है कि जिले में बड़ी नाट्य संस्थाओं के साथ नामीगिरामी कलाकारों का समागम हो रहा है। संपन्न हुआ आरंगम और देशज इसका उदाहरण है। रंगमंच को सशक्त करने और कलाकारों के उत्थान के लिए कोई सार्थक और मजबूत व्यवस्था नहीं है। इसके चलते आज समृद्धिशाली होते हुए भी यहां का रंगमंच सूना है।
प्लेटफार्म न होने से रंगकर्मी बन गए है किसी न किसी के ब्रांड
जिले में करीब 30 युवा है, जो पूर्णतया रंगमंच से जुड़े हैं, लेकिन समुचित व्यवस्था न होने कारण यह रंगकर्मी किसी नेता, किसी डाक्टर तो किसी संस्था के बंधन में बंधकर रह गए हैं। बोले अगर रंगमंच को सशक्त बनाना है तो जरूरी है कि रंगमंच के प्रति लोगों को जागरूक करना होगा। इसके बाद रंगमंच और कलाकार खुद ब खुद सशक्त हो जाएंगे। बोले जिले में कोई भी कार्यक्रम कराने के लिए एक बार सोचना पड़ता है। - अभिषेक पंडित, वरिष्ठ रंगकर्मी
जागरूक नहीं है जिले की जनता
किसी भी दिवस का आयोजन करने के पीछे मकसद होता है, उसके प्रति लोगों को जागरूक करना। इसी क्रम में आज अंतर्राष्ट्रीय रंगमंच दिवस तो है, लेकिन इस विधा के प्रति लोगों को जागरूक करने की कोई व्यवस्था नहीं है। जबकि जिले की जनता रंगमंच के प्रति उदासीन है। इसका कारण कम खर्च में मनोरंजन के साधन का उपलब्ध होना है। बोली जब तक जनता का झुकाव रंगमंच की तरफ नहीं होगा, मंच सशक्त नहीं होगा। ममता पंडित, रंगकर्मी
कलाकारों के उत्थान की व्यवस्था की है जरूरत
पहले के जमाने में जिले का रंगमंच अभाव में था, लेकिन जनता रंगमंच के कलाकारों के साथ थी। इसके कारण अभाव में होने के बाद भी यह मंच सशक्त था, आज धन के मामले में रंगमंच समृद्धिशाली तो हुआ है, लेकिन लोगों का रुझान कम होने के कारण यह अधूरा है। बोले कलाकार को रुपया से ज्यादा प्रसिद्धि की चाहत होती है, इस जिले में इसकी कमी है। - सुनील दत्त विश्वकर्मा, रंगमंच कलाकार
जिले के कई कलाकार है आज बुंलदियों पर
आजमगढ़। जिले में रंगमंच से जुड़े कई कलाकार आज अपनी मेहनत लगन से बाहर जाकर बुलंदियों पर है। इसमें राजेश कुमार सिंह, वैभव सिंह, अमित राय आदि नाम प्रमुख हैं। राजेश कुमार सफल निर्देशक है। इनके निर्देशन में आंच, बागी फिल्में और अगले जनम मोहे बिटिया ही दीजै सीरियल तैयार हुआ हैं। इसी क्रम में वैभव सिंह ने भी कई सीरियल का निर्देशन कर चुके हैं। इसमें कबूल है, महाराणा प्रताप प्रमुख हैं।