जिन लेखकों और शायरों ने अपनी लेखनी और कर्म से सांस्कृतिक-सामाजिक आंदोलन को खड़ा किया, कैफी आजमी उन चंद लोगों में खास थे। उन्होंने शायरी से दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई। जीवन के आखिरी बीस वर्ष गांव के विकास के लिए संघर्ष करते गुजारे। उनके पैतृृक गांव मेजवां में आज वह हर एक सुविधा है जो एक आदर्श गांव में होनी चाहिए।
‘कोई तो सूद चुकाए कोई तो जिम्मा ले उस इंकलाब का जो आज तक उधार सा है’ ये पंक्तियां मशहूर शायर कैफी आजमी कीे हैं। फूलपुर तहसील के दक्षिण मेजवां गांव के एक जमींदार परिवार में 14 जनवरी सन् 1919 को कैफी आजमी का जन्म हुआ था। माता-पिता ने उनका नाम सैयद अतहर हुसैन रिजवी रखा था।
बाद में वे कैफी आजमी के नाम से पूरी दुनिया में मशहूर हुए। उनके खानदान के लोग गांव में इंसानियत और तहजीब की एक मिसाल थे। गांव के लोग विभिन्न धर्मों के अनुयायी होने के बावजूद आपस में एक-दूसरे को किसी न किसी रिश्ते से पुकारते थे। कैफी आजमी हमेशा गरीबों और मजदूरों के हक के लिए संघर्ष करते रहे।
उन्होंने 11 वर्ष की उम्र में पहली गजल लिखी थी। कैफी उर्दू के प्रति अधिक भावुक थे, उर्दू की उपेक्षा पर एक बार उन्होंने पद्मश्री तक वापस कर दिया। वे जिंदगी भर बोलकर, लिखकर प्रतिरोध करते रहे। उनकी रचनाशीलता अंतिम सांस तक सक्रिय रही। उन्होंने 1943 में मुंबई में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के उर्दू समाचार पत्र कौमी जंग में कुछ दिन काम किया। इसके बाद उन्होंने प्रख्यात नाट्य कर्मी शौकत से निकाह कर लिया।
फिल्मों में उन्होंने गीत लेखन अपने जीवन यापन के लिए किया था, 1948 में शहीद लतीफ की ’बुजदिल’ उनकी पहली फिल्म थी। ‘शमा’, ‘कागज के फूल’, ‘हकीकत’, ‘पाकीजा’, ‘शोला और शबनम’, ‘अर्थ’, ‘अनुपमा’, ‘हंसते जख्म’, ‘मंथन’, ‘हीर रांझा‘, ‘शगुन’, ‘हिंदुस्तान की कसम’, ‘नौनिहाल’, ‘नसीब‘, ‘फिर तेरी कहानी याद आई‘, ‘तमन्ना’ सहित कई फिल्मों में उन्होंने गीत लिखें। जिले में कैफी साहब की स्मृतियों को याद करते हुए पूर्व प्रधान एखलाक अहमद कहते हैं कि वह जमींदार घराने के होने के बावजूद गरीबों के दर्द को शिद्दत से महसूस करते थे। यह बाद में उनकी शायरी का हिस्सा बन गया।