कई वर्षों से कम बारिश और सबमर्सिबल से हो रहे जलदोहन का परिणाम है कि जिले में पानी का स्तर लगातार गिरता जा रहा है। हालात यह है कि कई क्षेत्र डार्क जोन की श्रेणी में पहुंचने लगे हैं। जलस्तर में गिरावट का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सामान्य हैंडपंपों के साथ इंडिया मार्का टू हैंडपंप भी पानी छोड़ रहा है। विभाग पाइप बढ़ाकर पानी निकालने की व्यवस्था तो कर रहा है लेकिन जलस्तर को स्थिर बनाने की कवायद नहीं की जा रही। आलम है कि बाजार में खुलेआम आधा लीटर दूध के दाम के बराबर एक लीटर पानी का बोतल बाजार में बिक रहा है।
जिले में पिछले कई सालों से सामान्य से कम बारिश हुई। इसके चलते सबसे ज्यादा परेशानी किसानों को उठानी पड़ी। उनकी पैदावार उम्मीद से काफी कम हुई। कई जगह तो लागत भी नहीं निकल पाई और खेत में फसल को जला देना पड़ा। इसके अलावा, भूगर्भ जलस्तर की सि्थति चिंताजनक होती गई। जिले में हालात यह है कि अभी अप्रैल का महीना शुरू ही हुआ है कि हैंडपंप जवाब देने लग गए हैं।
वर्तमान समय में धनाभाव के कारण जिले में 20 परियोजनाएं अपूर्ण हैं। लोहिया गांवों में हैंडपंप लगाने का काम अधर में हैं। बताते चले वर्ष 2013 में जिले में 631.46 मिमी, 2014 में 461.13 मिमी तथा 2015 में 538.08 मिमी बरसात हुई। इसका परिणाम है कि इस वर्ष अभी गर्मी की शुरुआत होने वाली है और अप्रैल माह में ही हैंडपंपों के पानी छोड़ने की समस्या शुरू हो गई है।
लोगों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने के लिए जिम्मेदार जलनिगम भी खुद को असहाय महसूस कर रहा है। जल निगम के आंकड़ों पर निगाह डाले तो वर्ष 2015-2016 में प्रत्येक ब्लाक में 50-50 हैंडपंपों को रिबोर करने के साथ ही वर्ष 2014-2015 के अधूरे 800 हैंडपंपों को रिबोर किया जाना है। जल संबंधी 20 परियोजनाओं में आठ परियोजनाएं बीते वर्ष की हैं। सभी 20 परियोजनाओं की लागत 4962.78 लाख रुपये है। जबकि विभाग को 1433.86 लाख रुपये मिला है, जो लागत के मुकाबले 29 प्रतिशत राशि ही है। एेसे में कैसे काम होगा।
वहीं, अभी हाल ही में प्रदेश सरकार की ओर से जनपद के 46 लोहिया गांवों में 280 हैंडपंप लगाकर इन्हें संतृप्त करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है लेकिन अभी तक इसके लिए धनराशि उपलब्ध नहीं हुई। इस संबंध में अधिशासी अधिकारी जलनिगम एसके सिंह यादव ने बताया कि धनाभाव के कारण परियोजनाएं रुकी हैं। धन अवमुक्त होने का इंतजार किया जा रहा है।