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Lok Sabha Bypoll: आजमगढ़ में आखिरकार मुलायम परिवार से ही आया नया प्रत्याशी, यहां मोदी लहर में भी खूब दौड़ी साइकिल

Wed, 01 Jun 2022 02:01 PM IST
उत्पल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी

सार

आजमगढ़ लोकसभा उपचुनाव के लिए समाजवादी पार्टी ने  डिंपल यादव  को उम्मीदवार घोषित किया है। 
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डिंपल यादव - फोटो : Self
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विस्तार
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आजमगढ़ लोकसभा उपचुनाव में समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार को लेकर लगाए जा रहे कयासों पर मंगलवार को विराम लग गया। अखिलेश यादव द्वारा खाली की गई सीट पर उनकी पत्नी डिंपल यादव को टिकट मिलने की घोषणा हुई।  2014 में आजमगढ़ लोकसभा सीट से सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव चुनाव लड़े और जीत हासिल की।

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इसके बाद 2019 में उनके उत्तराधिकारी सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव इस सीट से चुनाव लड़ने के लिए मैदान में उतरे। आजमगढ़ की समाजवादी जनता ने उनके गले में जीत का हार डाला। लेकिन 2022 में हुए विधानसभा चुनाव में करहल से चुनाव जीतने के बाद अखिलेश ने आजमगढ़ संसदीय सीट से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद इस सीट पर उपचुनाव की घोषणा की गई।

इस घोषणा के बाद भाजपा से ज्यादा लोग सपा उम्मीदवार को लेकर चर्चा करते नजर आए कि अखिलेश के बाद इस सीट पर कौन सपा का प्रत्याशी होगा। हर किसी की नजरें इस निर्णय पर टिकी थी। जिस तरह से अखिलेश यादव ने राज्यसभा से डिंपल का नाम वापस लेकर जयंत को राज्यसभा भेजा तभी से उनके आजमगढ़ सीट से चुनाव मैदान में उतरने के कयास लगने शुरू हो गए। वहीं सपा जिलाध्यक्ष हवलदार यादव भी टिकट के लिए कतार में खड़े थे। लेकिन मंगलवार को सारे कयासों पर विराम लगाते हुए सपा सुप्रीमो ने आजमगढ़ संसदीय सीट पर डिंपल के नाम की मुहर लगाई।
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23 जून को मतदान व 26 जून को मतगणना होगी। नामांकन खरीदने व दाखिल करने का दो दिन का समय बीत गया लेकिन किसी प्रत्याशी द्वारा अपना पर्चा दाखिल नहीं किया गया। नामांकन की अंतिम तिथि 6 जून है।

आजमगढ़...मतलब सपा का गढ़

आजमगढ़ को ऐसे ही सपा का गढ़ नहीं कहा जाता है यह बात विधानसभा में भी साबित हो गई। भले ही भाजपा ने प्रदेश में सरकार बना ली लेकिन जनपद की दसों विधानसभा सीटों पर सपा ने कब्जा जमा लिया। कुछ ऐसा ही हाल लोकसभा में रहा है। मोदी लहर में आजमगढ़ संसदीय सीट पर सपा का ही कब्जा रहा। 

2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी की प्रचंड लहर पूरे देश में चल रही थी तब सपा मुखिया रहे मुलायम सिंह यादव यहां से चुनाव लड़ने आए। भाजपा ने उनके खिलाफ रमाकांत यादव को मैदान में उतारा। लेकिन मुलायम सिंह यादव ने भाजपा प्रत्याशी को पछाड़ते हुए जीत हासिल की।  इसके बाद जब 2019 के लोकसभा चुनाव हुए तो मुलायम सिंह यादव के उत्तराधिकारी और सपा मुखिया अखिलेश यादव इस सीट से चुनाव लड़ने के लिए मैदान में उतरे। जनपद की जनता ने एक बार फिर मोदी लहर के विपरीत सपा का साथ दिया और अखिलेश यादव ने भाजपा प्रत्याशी दिनेश लाल यादव निरहुआ को पराजित करते हुए जीत हासिल करने में कामयाबी हासिल की। 

समाजवादी सोच वाला जनपद देता रहा है सत्ता के खिलाफ जनादेश

आजमगढ़ हमेशा सत्ता के खिलाफ खड़ा मिला है। यहां के लोगों ने उसी को जनादेश दिया है जिस दल की देश व प्रदेश में सरकार नहीं रही है। बस कुछ ही मौके ऐसे आए हैं, जब यहां के लोगों ने ऐसे लोगों को जिताया, जिनकी सरकार बनी। जो इस जिले के पिछड़ेपन का यह एक बड़ा कारण रहा है। वैसे इस जिले की सोच हमेशा से समाजवादी रही है और समाजवादी सरकारों में इस जिले का विकास भी हुआ है।

मुस्लिम या यादव की होती है जीत

वर्ष 1996 से आजमगढ़ में सिर्फ मुस्लिम और यादव उम्मीदवार ही जीतते रहे हैं। रमाकांत यादव ने यहां साल 1996 और 1999 में एसपी प्रत्याशी के तौर पर जीत हासिल की थी। वह साल 2004 में बीएसपी और 2009 में बीजेपी के टिकट पर चुनाव जीते थे। साल 1998 और 2008 में इस सीट पर हुए उपचुनावों में बीएसपी के अकबर अहमद डंपी ने फतह हासिल की थी।

वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव ने बीजेपी उम्मीदवार रमाकांत यादव को करीब 63 हजार मतों से हराया था। इस लोकसभा क्षेत्र में करीब 19 लाख मतदाताओं में से साढ़े तीन लाख से अधिक यादव, तीन लाख से ज्यादा मुसलमान और करीब तीन लाख दलित हैं।
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70 के दशक तक कांग्रेस का थी गढ़

70 के दशक तक आजमगढ़ सीट कांग्रेस की रही। यहां लंबे समय तक (1952 से 1971) तक कांग्रेस का राज रहा, लेकिन 70 के दशक में एक बार जो यह सीट पार्टी से फिसली तो फिर कांग्रेस कभी वैसा प्रदर्शन नहीं कर पाई। पर 1984 में जरूर कांग्रेस ने एक बार फिर इस सीट पर कब्जा किया लेकिन उसके बाद से अब तक यह सीट कांग्रेस के हाथ नहीं लगी है। हालांकि 2009 में एक बार इस सीट पर बीजेपी भी कमल खिलाने में सफल हुई है। वहीं 1952 के बाद अब तक के इतिहास को देखें तो बीएसपी भी चार बार यह सीट कब्जाने में सफल रही है।
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