आधुनिकता की दौड़ में सबकुछ खोता जा रहा है। ऐसे में अपनी पुरानी परंपराओं को संजोने की जरूरत है।सावन माह में कजरी की अलग ही पहचान है लेकिन सावन शुरू हुए लगभग 10 दिन से अधिक हो चुके हैं अभी तक कहीं से भी कजरी सुनने को नहीं मिली है। ना ही कहीं पेड़ों पर झूला ही नजर आ रहा है। सावन का एक सोमवार बीत चुका है और दूसरा आने को है लेकिन कहीं भी झूला और कजरी गीतों की मधुर धुन सुनने को नहीं मिल रही है। जबकि कजरी की धुन इतनी लोकप्रिय है कि शास्त्रीय संगीत के घरानों ने भी इसे अपनाकर वाहवाही लूटा। सावन की काली घटाओं के बीच खेतों में धान की रोपाई करते महिलाएं या पेड़ों पर झूला झूलती हुई महिलाओं द्वारा गाए जाने वाली कजरी का हर कोई दीवाना था। लेकिन आज इस पर आधुनिकता के बादल छा गए हैं। आज युवा वर्ग के लोगों को कजरी के बारे में कोई जानकारी नहीं है। ना ही उसे इसे जानने की कोई उत्सुकता है। एक समय था जब सावन महीने की शुरूआत होते ही कजरी की धुन सुनाई पड़ने लगती थी। कहीं खेतों में धान की रोपाई करती महिलाएं इसे गाती तो कहीं घर में ओखल में कुटाई करते हुए महिलाएं टोली बनाकर इसे गाती थी। कजरी गायक राजेश राय ने बताया कि कजरी की धुन ऐसी है कि वह प्रकृति को मनुष्य से जोड़ती है। आज भी हम लोग गांव में टोली बनाकर सावन के महीने में कहीं न कहीं कजरी गाते हैं। उम्र दराज लोग इसे बड़े चाव से सुनते हैं। उनकी फरमाइश पर कजरी सुनी जाती है। कोई विरह वेदना की कजरी सुनना चाहता है तो भक्ति रस से सरोबार कजरी को मन से सुनता है। लेकिन जो युवा पीढ़ी है उससे कोई मतलब नहीं है। पर इस विलुप्त होती कला को सहेजने की जरूरत है।मशहूर हरिहरपुर घराना इस विधा को बचाने के लिए हर वर्ष कजरी महोत्सव का आयोजन करता है। इस बार भी 26, 27 और 28 अगस्त को कजरी महोत्सव होगा। हरिहरपुर के मशहूर गायक अजय मिश्रा ने कहा कि यह विधा धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही है। जिसे बचाने के लिए वह प्रयास में जुटे हैं। इसी के तहत वर्ष कजरी महोत्सव का आयोजन करते आ रहे हैं।