भूमंडलीकरण के दौर में किताबें ही ज्ञान प्रवाह का केंद्र है। आजमगढ़ जनपद की मिट्टी में ऐसे बहुत से रचनाकारों ने जन्म लिया है जिनकी रचनाशीलता ने पूरी दुनिया में इस सरजमी को पहचान दी है। जिले में दारुल मुसन्नफीन और राजकीय पुस्तकालय जैसे इदारे साहित्य की इबारत लिखे और आज युवाओं के लिए ज्ञान प्रवाह का केंद्र बने हुए हैं। दोनों पुस्तकालयों में एक लाख 37 हजार पुस्तकें मौजूद हैं।
राहुल सांकृत्यायन की भागो नहीं दुनिया को बदलो, कनैला की कथा, दर्शन दिग्दर्शन, सोने की ढाल, तुम्हारे धर्म की क्षय हो, मेरी जीवन यात्रा ऐसी कालजयी रचनाएं हैं, जो विश्व साहित्य की धरोहर है। अल्लामा शिब्ली नोमानी की शख्सियत से हम सभी परिचित है। वह केवल एक लेखक ही नहीं थे, बल्कि ऐसे समाज सुधारक थे, जो साहित्य लिखते ही नहीं थे बल्कि साहित्य की नई पीढ़ी निरंतर अपने दायित्व का निर्वाह करे इसके लिए शिब्ली अकादमी के दारुल मुसन्नफीन जैसा एक इदारा खड़ा किया।
निश्चित तौर पर किताबों की दुनिया का यह केंद्र आजमगढ़ को एक नई पहचान दे रहा है। आज दुनिया के कोने-कोने से आने वाले लोग इस बात पर हैरान होते हैं कि कैसे बिना किसी सरकारी अनुदान के यह परिसर साहित्य का तीर्थ बना हुआ है। ऐसा नहीं है कि शहर में यह अकेला पुस्तकालय है। राहुल सांकृत्यायन जिला पुस्तकालय में विद्यार्थियों की उपस्थित आजमगढ़ के बेहतर भविष्य का आश्वासन देती है।
मेहता लाइब्रेरी की जर्जर स्थिति देखकर शहरवासियों का मन आहत हुआ है। यह धरती अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध की रचना प्रिय प्रवास की धरती है तो वहीं ठेठ हिंदी का ठाठ जैसी कालजयी रचना का जन्म भी इसी धरा पर हुआ है। लक्ष्मी नारायण मिश्र की सिंदूर की होली है या फिर कैफी आजमी की सरमाया। हर दौर में आजमगढ़ की आवाज बुलंद होती रही। आजमगढ़ में शुरुआत समिति द्वारा संचालित सृजन परिसर में बचपन में किताबें थीम पर आठ हजार से अधिक किताबों का संग्रह शहर के एक कोने का साहित्य प्यास बुझा रहा है।