महिलाएं आपस में कीचड़ खेलती थीं, पुरुष जोगीरा गाते थे और पूरे गांव में उत्सव जैसा माहौल रहता था। होलिका दहन और होली के दिन घर-घर जाकर फगुआ गीत गाए जाते थे। लोगों द्वारा गुजिया, भांग की ठंडई और अन्य पकवान खिलाकर टोली का स्वागत किया जाता था।
अबीर-गुलाल लगाकर लोग गले मिलते और गिले-शिकवे भुला देते थे। घाघरा गांव में आज भी गिरजा गोड़, मेवालाल पटेल, राजेंद्र पटेल, सुभाष गोंड, जय सिंह पटेल, दंगल पटेल, राम लखन पटेल, दूधनाथ यादव, रंजीत गोंड और रेखा सहित कई ग्रामीण होली के अवसर पर फगुआ गाते हैं। मेवा लाल हरमोनिया और दूधनाथ ढोलक बजाकर लोक परंपरा को जीवित रखे हुए हैं।
बोले लोग
पहले बसंत पंचमी से ही फगुआ शुरू हो जाता था, लेकिन अब लोग एक-दूसरे से दूर होते जा रहे हैं। मनमुटाव बढ़ रहा है। फिर भी हमारे गांव में होलिका दहन और होली के दिन फगुआ जरूर गाया जाता है। मेरे द्वारा लिखित फगुआ ‘रंग बरसे फगुनवा होली में…’ आज भी गूंजता है। - सुभाष गोंड।
होली के दिन गांव में लोग आज भी एक-दूसरे के दरवाजे पर जाकर फगुआ, चैता और कबीरा गाते हैं। दरवाजे पर जाने पर लोग भांग की ठंडई, गुजिया और अन्य पकवान खिलाते हैं। अबीर-गुलाल उड़ाकर स्वागत किया जाता है। होली समरसता का पर्व है, जो लोगों को जोड़ता है। - गिरजा गोंड़।
पहले होली में जो मिठास थी, वह अब कम हो गई है। पहले लोग आपसी मतभेद भुलाकर होली मनाते थे। ढोल-हरमोनिया के साथ रात भर फगुआ गाया जाता था, लेकिन अब यह परंपरा धीरे-धीरे कम हो रही है। - रेखा पटेल।
आधुनिकता और डीजे के बढ़ते प्रचलन ने पारंपरिक फगुआ की जगह ले ली है। महिलाएं पहले पूरी रात फगुआ और चैता गाती थीं, लेकिन अब यह परंपरा विलुप्त होती जा रही है। इसे बचाने के लिए सबको आगे आना होगा। - भृगुनाथ पटेल।