देशज में शंकरगढ़ संग्राम और फूलसिंह की प्रस्तुति की गई। दोनों की प्रस्तुतियों में राजसी शान, अभिमान, वीरता हास्य, करुणा, समर्पण के साथ मुहब्बत की झलक देखने को मिली। दोनों के संवाद में लोक गायन ठुमरी, कवित्त, छंद, दौड़, दो बोला विधाओं का समावेश था। शंकरगढ़ संग्राम की कहानी में मनबढ़ राजा शंकर सिंह, जिसके अंदर अभिमान भरा था। एक बार उसके राज्य से होकर आल्हा और रूदल का नक्कारा गुजरा।
राजा ने एलान किया कि उनके राज्य की सीमा से नक्कारा बजते हुए नहीं जाएगा लेकिन आल्हा और रूदल भी अड़ गए कि नक्कारा बजते हुए ही जाएगा। परिणामस्वरुप युद्ध शुरू हो गया। शाम तक राजा शंकर युद्ध नहीं जीत सकें। उन्होंने रणनीति बनाकर आल्हा-रूदल के भांजे की नवविवाहिता पत्नी जमुना का अपहरण करवा लिया। आल्हा-रूदल के भाई नवेली दुल्हन को ढ़ूढने के लिए मालिन का रूप धरकर शंकरगढ़ पहुंचता है।
राजा शंकर की पुत्री कमला उस पर मोहित हो जाती है, कमला के प्रयास से नवल दुल्हन जमुना को ढ़ुढ़कर सकुशल गढ़ से निकल जाता है। राजा शंकर सिंह बहुत शर्मिदा होते है, परिणामस्वरूप पुत्री को लेकर आल्हा-रूदल के पास जाकर समर्पण कर देता है। साथ नवल से कमला की शादी हो जाती है। इसी क्रम में फूलसिंह की कहानी में मियाल कोट के राजा गजेंद्र सिंह के छोटे बेटे फूलसिंह का एक दिन अपनी भाभी से पानी देने को लेकर विवाद हो जाता है।
भाभी ने देवर फूलसिंह का ताना दे देती हैं कि इतना ही नखरा करना है तो मुल्तान की सुंदर शहजादी नौटंकी को ब्याह लाओ और उसी के हाथ का पानी पियो। यह बात फूलसिंह को लग गई। वह शहजादी नौटंकी से ब्याह करने की ठान लेता है। वह स्वांग करके मुल्तान पहुंच जाता है, क्योंकि मुल्तान के राजा से उसके रियासत की दुश्मनी चलती थी। विभिन्न स्वांग के जरिए फूलसिंह शहजादी नौटंकी तक पहुंच जाता है।
फूलसिंह के कार्यों को देख शहजादी नौटंकी उससे प्यार करने लगती है। फूलसिंह उसे अपनी असलियत बता देता है। दोनों मुल्तान के राजा को शादी करने के लिए राजी कर लेते हैं। साथ ही घर लाकर शहजादी नौटंकी के हाथ से फूलसिंह अपनी भाभी के सामने पानी मंगाकर पीता है।