वित्त व लेखाधिकारी कार्यालय में लेखाकार के पद पर रहे राणा प्रताप सिंह की नियुक्ति को दो फरवरी 2012 को हाईकोर्ट ने अवैध करार दिया। इसके बाद भी उक्त लेखाकार कार्यालय में उक्त पद पर कार्य करते हुए पांच साल तक वेतन आहरण करता रहा। भारतीय मानवाधिकार एसोसिएशन के सदस्य अरूण कुमार सिंह ने शनिवार को जिलाधिकारी को प्रार्थना पत्र सौंपा। जिसमें उन्होंने उक्त लेखाकार द्वारा उपस्थिति पंजिका पर किए जा रहे हस्ताक्षर को रोकने और पांच वर्षों तक अवैध रूप से लिए गए धन के रिकवरी की मांग की।
अरुण ने जिलाधिकारी को बताया कि राणाप्रताप सिंह वित्त एवं लेखाधिकारी कार्यालय में लेखाकार के पद पर तैनात थे। अरुण कुमार सिंह द्वारा की गई शिकायत पर हाईकोर्ट के आदेश पर इस बात का खुलासा हुआ कि राणा प्रताप की नियुक्ति कनिष्ठ लेखा लिपिक के पद पर अस्थाई रूप से हुई थी। पहले इस पद पर रहे शिवकुमार राय का प्रमोशन लेखाकार के पद पर हुआ था। लेकिन कुछ दिन बाद ही उनकी पदोन्नति वापस हो गई। जिससे वह दोबारा कनिष्ठ लेखा लिपिक पद पर आ गए। उनके आने के बाद अस्थाई रूप से तैनात राणा प्रताप सिंह की सेवा समाप्त कर दी गई। सेवा समाप्ति के बाद राणा प्रताप सिंह और शिवकुमार राय अपने-अपने पद पर तैनाती के लिए हाईकोर्ट में याचिका दाखिल किए। जिसमें हाईकोर्ट ने तीन महीने के लिए स्थगन आदेश जारी किया। जिसके कारण दोनों लोग अपने-अपने पद पर तैनात हो गए।