जनपद का एक मात्र सुखदेव पहलवान स्पोर्ट्स स्टेडियम कोच की कमी से जूझ रहा है। इसके कारण हैंडबॉल और बैडमिंटन के खिलाड़ियों को ठीक से प्रशिक्षण नहीं मिल रहा है। वह आते हैं और खेलकर चले जातेे हैं। अगर देखा जाए तो बैडमिंटन में पांच दर्जन छात्रों ने पंजीकरण का रजिस्ट्रेशन करा रखा है। वहीं, हैंडबाल में भी लगभग दो दर्जन खिलाड़ियों ने प्रशिक्षण के लिए आवेदन किया है।
स्टेडियम में जिम्नास्टिक, कबड्डी, फुटबाल, बालीवॉल, हाकी, क्रिकेट, कुश्ती आदि के कोच जरूर हैं। इन कोचों केे सुबह और शाम दोनों समय खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देना होता है लेकिन अगर सूत्रों की मानें तो बहुत से कोच सिर्फ एक टाइम ही कोचिंग देने के लिए स्टेडियम पहुंचते हैं। जबकि सरकार की ओर से इन्हें 25000 रुपये का मानदेय प्रतिमाह दिया जाता है। वहीं, साल में तीन महीने कोचिंग बंद भी रहती है।
2015-16 में स्टेडियम में कोचों और खिलाड़ियों को मिलने वाली सुविधाओं के लिए लगभग सात लाख रुपये का बजट मिला था। क्षेत्रीय क्रीड़ाधिकारी चंद्रमौलि पांडेय ने बताया कि जो बजट आया था, उसमें से 50 हजार रुपये खिलाड़ियों को मिलने वाली सुविधाओं पर खर्च करना था।
इस धनराशि से बालीवॉल, फुटबाल, क्रिकेट की गेंद, बल्ला, पैड, हाकी गेंद आदि सामान उपलब्ध कराए जाते हैं। अगर सूत्रों की मानें तो खिलाड़ियों को बैट और पैड कभी मिला हो, इसकी जानकारी किसी को नहीं है। शेष धनराशि से कोच को मानदेय दिया जाता है। बताया कि उनके आने पर स्टेडियम का एक हिस्सा बेकार पड़ा हुआ था, जिसे उन्होंने ठीक कराया। आज उस स्थान पर बालीवॉल का कोर्ट है।
उन्होंने स्टेडियम में मिनी स्वीमिंग पुल निर्माण के लिए शासन को पत्र भेजा है। लेकिन अभी तक उस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। वर्ष 2010-11 में 48.90 लाख रुपये की लागत से बना सिंथेटिक कोर्ट आज कोच न होने के कारण बेकार पड़ा है। अब तो यह जगह-जगह से टूटने भी लगा है। कहा कि इस कोर्ट को इंडोर होना चाहिए।
स्वयं करते हैं सामान की व्यवस्था : जनपद में प्रतिभावान खिलाड़ियों की कोई कमी नहीं है लेकिन सुखदेव पहलवान स्पोर्ट्स स्टेडियम में खिलाड़ियों को कोई सुविधा नहीं मिलती। उन्हें खेल में प्रयुक्त होने वाले सारे सामानों की व्यवस्था स्वयं करनी पड़ती है। अगर सुविधाएं मिलनी शुरू हो जाएं तो जनपद के खिलाड़ी भी राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जनपद के नाम को रोशन कर सकते हैं। - मुकेश यादव, पूर्व क्रिकेट खिलाड़ी
शासन से नहीं मिलता कोई सहयोग : सुविधाओं के लिए कई बार शासन को पत्र भेजा गया लेकिन उनके द्वारा कोई कार्रवाई नहीं की गई। यह जनपद का दुर्भाग्य है कि जहां से कई खिलाड़ी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाए। लगभग चार वर्षों से उस स्टेडियम में बैडमिंटन का कोई कोच ही नहीं है। - शक्ति शर्मा, डिस्ट्रिक्ट बैडमिंटन क्लब के सचिव
प्राइमरी स्तर पर मजबूत हो खेल का ढांचा : जब तक प्राइमरी स्तर पर खेल का स्तर मजबूत नहीं होगा, राष्ट्रीय खेल में प्रतिभाओं की कमी बनी रहेगी। स्टेडियम में हॉकी कोच भी नहीं है। जो कोच हैं, वह भी मनमानी करते हैं। इसके कारण हॉकी के साथ ही अन्य खेलों का स्तर भी काफी गिरा हुआ है। - अबुल्लैस खां, जिला हाकी संघ सचिव