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कार्तिका पूर्णिमा मेला, दुर्वासा धाम पर तैयारियां पूर्ण, बटोर आज

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मेजवां। कार्तिक पूर्णिमा स्नान के लिए फूलपुर क्षेत्र के पौराणिक स्थल दुर्वासा धाम पर रविवार से ही श्रद्धालुओं के पहुंचने का क्रम शुरु हो गया था। तमसा-मंजूषा के पावन तट पर स्थित दुर्वासा धाम पर लगने वाले तीन दिवसीय मेले को लेकर श्रद्धालुओं के आने का क्रम शुरू हो गया है। 11 नवंबर से यहां मेला शुरु होगा। धाम स्थल पर दुकानदारों ने जहां अपनी दुकाने लगा दी हैं। बताते चलें सोवमार को बटोर के बाद मंगलवार को कार्तिक पूर्णिमा का स्नान होगा। जिले के दुर्वासा धाम पर तमसा और मंजुषा नदी का संगम है। इस कारण श्रद्धालुओं में इस स्थान के प्रति काफी आस्था है। हर वर्ष इस स्थान पर कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर यहां हजारों श्रद्धालु पहुंचकर डुबकी लगाते हैं। इस क्रम में फूलपुर तहसील मुख्यालय से पांच किमी उत्तर दुर्वासा धाम पर कार्तिक पूर्णिमा पर तीन दिवसीय मेला लगता है। 11 नवंबर को बटोर, 12 को पूर्णिमा स्नान, 13 तथा 14 नवंबर को स्थानीय मेला लगेगा। दुर्वासा परिक्षेत्र में स्नानार्थी सोमवार से जुटना शुरु हो गए हैं। एक किलोमीटर की परिधि में लगने वाले इस मेले में मीठे और नमकीन खजलो की दुकाने सज गई है। आसमानी झूला, काला जादू, मौत का कुआं आादि कई तरह के मनरोंजन के साधन उपलब्ध है। मेला में जल निकासी की व्यवस्था सही नहीं है। जिससे लोगों को दिक्कते हो रही है। दूर-दराज से आई महिलाएं महर्षि दुर्वासा ऋषि की महिमा गीत गाती हुई तमसा-मंजुषा के पवित्र तट पर पहुंच रही है। समिति के अध्यक्ष प्रेम गिरी और बलराम तिवारी ने बताया कि मेला में आने वालों को कोई परेशानी नही होगी। दुर्वासा के प्रधान राम कवल तिवारी ने बताया कि ग्राम सभा की ओर से जो भी संभव है, वह व्यवस्था की जा रही है। फूलपुर कोतवाल केके गुप्ता ने बताया कि मेला क्षेत्र में फायर दस्ता, पीएसी के जवानों के साथ सीसी टीवी कैमरे से सुरक्षा व्यवस्था की व्यवस्था है। इसके अलावा डायल 112 और एंबुुलेंस लगाई गई है। मेला क्षेत्र को चार भागों में बांटा गया है । अराजक तत्वों पर कड़ी नजर रहेगी।
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शिव के अंश दुर्वासा ने यहां की थी तपस्या
मेजवां। तमसा और मंझुई नदी के संगम पर स्थित पौराणिक स्थल दुर्वासा धाम पर शिव के अंश और माता अनुसुईया के पुत्र महर्षि दुर्वासा सहित 88 हजार ऋषियों ने तपस्या की थी। महर्षि के इस तपोभूमि को महर्षि दुर्वासा धाम के नाम से जाना जाता है। पुराणों के अनुसार एक बार अत्रिमुनी तप करने गए थे। इनकी पत्नी अनुसुइया एक पतिव्रता धर्म परायण महिला थी। एक बार त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु, महेश ने इसके सतित्व की परीक्षा लेनी चाही। वे रूप बदलकर इनके पास गए। माता अनुसुईया ने इन्हें पहचान लिया। तीनों देवों ने निव्रस्त्र होकर सामने आने को कहा। ऐसा करना एक सति के लिए कठिन था। ऐसी विषम परिस्थिति में माता अनुसुईया ने उपर कमंडल के जल छिडकऱ बालक बना दिया और निर्वस्त्र होकर तीनों बालकों को दुध पिलाया और अपने पास रख लिया। उधर तीनों देवताओं के न आने पर उनकी पत्नियां चिंतित हो गई और उन्हें खोजने निकल पड़ी। तीनों देवी सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती जी अत्रिमुनी के आश्रम पर पहुंची, यहां पर उन्हें सारी कहानी अनुसुईया के माध्यम से ज्ञात हुई। तीनों पालने में सो रहे थे। अनुसुईसा ने उन्हें अपने पति को पहचानने को कहा। लेकिन वे असफल रहीं। तब उन्होंने कमंडल से जल छिडकऱ तीनों देवों को पूर्व रूप दे दिया। तीनों देवों ने उनसे वर मांगने को कहा, वर के रूप में अनुसुईया ने तीनों को पुत्र रूप में जन्म लेने को कहा। कालांतर में वहीं तीनों देव दुर्वासा, दत्तात्रेय और चंद्रमा ऋषि के रूप में जन्म लिया। तीनों ने अलग-अलग स्थानों पर दुर्वासा, दत्तात्रेय और सिलनी तमसा तट के किनारे चंद्रमा ऋषि आश्रम पर तप किया।
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