आजमगढ़। ठंड धीरे-धीरे पांव पसारना शुरू कर दी है, लेकिन परिवहन निगन विभाग की तैयारियां अधूरी हैं। आलम यह है कि रेगुलर और अनुबंधित करीब 100 बसों की खिड़कियों के शीशे या तो टूटे पड़े हैं, या फिर ढीला होने के चलते हल्का सा भी ब्रेक लगने पर खुल जाया करते हैं। बसों की खिड़कियों के शीशे को टाइट रखने के लिए लगने वाले रबड़ का वाशर भी विभाग के पास मौजूद नहीं है। 35 ऐसी बसों भी हैं, जिनके सीट या बहुत ही गंदे हैं या फिर फट चुके हैं। इन बसों का फर्स भी टूटे हाल में है। बसों में गंदगी का अंबार लगा रहता है।
आजमगढ़ में एक डिपो आजमगढ़ के नाम से और दूसरा आंबेडकर डिपो के नाम से संचालित किया जाता है। आजमगढ़ डिपो के बेड़े में कुल 81 बसें हैं, और आंबेडकर नगर डिपो के बेड़े में 67 बसें शामिल हैं। शेष लगभग 22 अनुबंधित बसें हैं। सरकारी बसों की मरम्मत आदि का काम विभाग की तरफ से करवाया जाता है, जबकि अनुबंधित बसों की मरम्मत उनके मालिकों द्वारा करवाई जाती है। अनुबंधित ज्यादातर बसों का संचालन पूर्वांचल के जिलों में होता है। जबकि सरकारी बसें लंबी दूरी तय करती हैं। रोडवेज के दोनों डिपो के बेड़े में शामिल करीब 35 बसों की शीट और फर्श बहुत खराब हैं। इन्हें बदलवाने का निर्देश दिया गया, लेकिन कपड़े आदि न होने की वजह से बदला नहीं जा सका है। रोडवेज के वर्कशाप में पर्याप्त मात्रा में रबड़ का वाशर नहीं है। इन वाशरों के अभाव में करीब 100 बसों के शीशे ढीले हो गए हैं। जो हल्का सा भी ब्रेक लगने पर आगे चले जाते हैं और यात्री को सर्द हवा लगने से यात्रा के दौरान काफी परेशानी होती है। विभाग के लोगों की मानें तो विभाग के पास मौजूद ज्यादातर बसें अपनी निर्धारित तीन लाख से अधिक किलोमीटर की दूरी तय कर चुकी हैं, बावजूद इसके उन्हें दौड़ाया जा रहा।
एमडी के निर्देश पर जिन बस की खिड़कियों के शीशे आदि की मरम्मत करवा दी गई है। डिपो की 35 बसों के सीट और फर्श मामूली खराब हैं, जिन्हें दुरुस्त करने का काम चल रहा। रास्ता खराब होने की वजह से शीशों को टाइट रखने वाले रबड़ घिस जाते हैं, रबड़ वाले वाशर की बड़े पैमाने पर डिमांड की गई है। बसों की लगातार चेकिंग करते हुए खामियों को दुर किया जा रहा।
- पीके तिवारी, आरएम, आजमगढ़ रीजन