नेशनल लोेकरंग एकेडमी द्वारा आयोजित प्रतिरोध की संस्कृति, अवाम का सिनेमा में बुधवार को दूसरे दिन शिब्ली महाविद्यालय परिसर में गोष्ठी का आयोजन किया गया। वक्ताओं ने ‘सिनेमा की भाषा और भारतीय-नेपाली दस्तावेजी फिल्मों में उसका इस्तेमाल’ विषय पर चर्चा की।
नेपाल अखबार के संपादक रिशव देव घिमिरे ने कहा कि सिनेमा में प्रतिरोध बहुत जरूरी है, लेकिन संघर्ष के साथ-साथ कलात्मक सृजन होते रहना चाहिए। दरअसल सिनेमा सभी कलाकारों से मिलकर बनता है। जब सभी कलाओ, बेहतर सरोकारों की होड़ होगी तो नतीजे भी यथार्थवादी और सार्थक होंगे। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि भारतीय और नेपाली फिल्मों में प्रतिरोध जरूरी है। मैं नेपाल पहुंचकर इस पर बड़ी कार्यशाला आयोजित करूंगा।
नेपाल की प्रसिद्ध अभिनेत्री और निर्देशिका रायल कल्पना ने अपनी कई फिल्मों के मार्मिक प्रसंग सुनाते हुए कहा कि सिनेमा को अपनी भाषा बदलनी होगी। लेकिन जिस तरह से फिल्मी बाजार का विस्तार हो रहा है। हमें उसके खिलाफ अपने सुख दुख का सिनेमा शुरू करना होगा। सिनेमा पर शोध करने वाले अमित कमलदास ने कहा कि शुरूआती दौर भारतीय सिनेमा मिथ्यों पर बना।
लेकिन जैसे-जैसे आजादी का आंदोलन तेज हुआ वैसे ही सिनेमा की भाषा बदली और जनपक्षधर होता चला गया। गोष्ठी की अध्यक्षता विजय नरायन और संचालन एसके दत्ता ने किया। अवाम के सिनेमा के संस्थापक शाह आलम सबके प्रति आभार व्यक्त किया।