अमिलो। गुलामी की बेड़ी में जकड़े भारत को आजाद कराने के लिए नेता जी सुभाष चंद्र बोस के योगदान को भारत के स्वर्णिम अक्षरों में लिखा गया। ऐसे महान नेता सुभाष चंद्र बोस के ड्राइवर रहे 112 वर्षीय निजामुद्दीन मुबारकपुर थाने के ढकवा गांव में बदहाली, मुफलिसी के दौर से गुजर रहे हैं। गरीबी के चलते उनकी तीसरी पीढ़ी भी निरक्षर रह गई। मेहनत, मजदूरी कर पूरा परिवार किसी तरह आजाद भारत में एक-एक दिन काट रहा है। पूरा कुनबा बदहाली से गुजर रहा है।
निजामुद्दीन बर्मा की राजधानी रंगून से वर्ष 1969 में जब खाली हाथ वतन लौटे, तो सरकारी सहायता के लिए भाग-दौड़ की, लेकिन आजाद भारत में कोई सुनवाई नहीं हुई। परिवार का बोझ उठाने के लिए उन्होंने आजमगढ़ नगर के बाबू राम अग्रवाल के यहां गाड़ी चलाने की नौकरी कर ली। 170 रुपए मासिक आय से परिवार को चलाना मुश्किल था। दो पुत्रियों और चार पुत्रों को मामूली आमदनी पर पढ़ाना-लिखाना संभव नहीं हो पाया। ऐसे में सभी बच्चे शिक्षा से वंचित रह गए। नेता जी के ड्राइवर निजामुद्दीन का परिवार पुत्र और पौत्रों से भरा परिवार है। पत्नी अजबुन्निसा आज भी जीवित हैं। चार पुत्रों में अख्तर अली 85 वर्ष, अनवर अली 82 वर्ष, मोहम्मद अकरम 52 वर्ष के हैं। सबसे छोटे पुत्र असरफ को टीबी हो जाने पर इलाज के अभाव में चार वर्ष पूर्व मौत हो चुकी है। सभी पुत्र मेहनत और मजदूरी कर जीवन यापन करने को मजबूर हैं। लिहाजा गरीबी के चलते उनकी तीसरी पीढ़ी भी शिक्षा से वंचित रह गई। तीसरी पीढ़ी में पौत्र दाउद, इब्राहिम, अंबर, मोहम्मद सालिम, अहमद, मुहम्मद अली, अब्दुल्लाह सभी मजदूरी करकेबदहाल जीवन जी रहे हैं।
ड्राइवर निजामुद्दीन ने बताया कि बर्मा में सीटान नदी के पास नेता जी सुभाष चंद्र बोस को छोड़ा और उसके बाद से उनसे आज तक मुलाकात नहीं हुई। गुलाम भारत के साथ ही आजाद भारत को भी देख रहे निजामुद्दीन को अफसोस है कि आजाद भारत में गरीबी के चलते उनकी तीसरी पीढ़ी भी निरक्षर ही रह गई। निजामुद्दीन कहते हैं कि गुलाम भारत में किसी के अंदर छल-कपट नहीं था। लोग एक दूसरे पर विश्वास रखते थे। लोगों में ईमानदारी थी। लेकिन आज के दौर में बड़ा बदलाव आया। खासतौर से युवाओं के अंदर विश्वास नाम की चीज इस दौर में नहीं रह गई है। लोगों में प्रेम के बजाय कटुता भर गई है।