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गांव भी भूल गए अपनी लोक परंपरा

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अंबारी। जिले के शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्र से फागुनी गीतों की लोक परंपरा धीरे धीरे गायब होती चली जा रही हैं। होली का पर्व नजदीक आने के बावजूद अब गांवों में होली गीत, फगुआ, चैता, लचारी, कहंरवा आदि गीत सुनाई नहीं दे रहा है। पहले शिवरात्रि के बाद से ही यह गीत अपनी मधुर धुन से सभी को अपनी ओर आकर्षित करते थे। उक्त बातें जनहितकारी सेवा संस्थान के संस्थापक त्रिलोकीनाथ पांडेय ने कही। उन्होंने कहा कि समय के साथ ही हमारे लोकगीत और परंपराएं विलुप्त होती नजर आ रहीं हैं। इस भागम भाग भरी दुनिया में गांव भी इतना आगे निकल गया है कि अपनी लोक परंपरा को भूल गया है। एक समय था जब फागुन महीना चढ़ते ही गांव गांव में फागुनी गीत सुनाई देते थे। बड़े, बूढ़े, जवान सभी एक साथ मंदिर, मैदान, चौपाल या गांव के किसी व्यक्ति के दरवाजे पर शाम होते ही बैठ जाते थे। ढ़ोलक, हारमोनियम, झांझ और मंजीरे की धुन पर सुर में सुर मिलाते थे। कभी होली गीत, फगुआ, चैता, कभी लचारी तो कभी कहंरवा इन लोकगीतों की धुन पर जैसे पूरा गांव ही फागुनी बयार में डूब जाता था। इन गीतों के ही साथ बाबा काका भइया के संबोधन से गांव की एकता और परस्पर प्रेम परवान चढ़ता था। विरासत में मिली इस परंपरा को सहेजने की आवश्यकता है। समय के साथ जैसे जैसे यह लोक गीत और परंपराएं गायब हो रही हैं वैसे ही गांव की एकता, परस्पर प्रेम और आदर भी विलीन होता जा रहा है। होली हमारी लोक संस्कृति और परंपरा की बुनियाद है। जिस दिन ये बुनियाद खत्म हो जाएगी उस दिन हमारी लोक संस्कृति भी इतिहास की बात हो जाएगी। अब कुछ गिने चुने लोग ही इस विरासत को जिंदा किए हैं।
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