सठियांव। अब इसे दुर्भाग्य ही कहेंगे कि एक साहित्यकार जिसकी पुस्तक का विमोचन होने वाला हो और वह विमोचन के कुछ घंटे पूर्व दुनियां को अलविदा कह दे। पुस्तक की सराहना लोगों के मुंह से सुनने की लालसा लिए पंडित पारसनाथ गोवर्धन इस दुनिया से भले ही चले गए लेकिन उनकी पुस्तकें अनंतकाल तक लोगों का मार्ग दर्शन करते हुए उनकी याद दिलाती रहेंगी। सठियांव विकास खंड के नासिरूद्दीनपुर गांव निवासी प्रसिद्घ रचनाकार पारसनाथ गोवर्धन की शुरू से ही साहित्य के प्रति गहरी रुचि थी। उनके पिता स्व. रामबली पांडेय किसान थे वहीं उनकी माता स्व. भानुमति गृहिणी थी। इनकी प्राथमिक से लेकर इंटर तक की शिक्षा सठियांव में हुई। स्नातक की परीक्षा उन्होंने चंडेश्वर से पास की। इनके प्रसिद्घ साहित्य में चार एकांकी, खंडित खंभो का सेतु, राम की अंतर्वेदना, दंशित आस्था, अहिल्या, साहित्य और परिवेश, दृष्टिकोण, सौंदर्यानुभूति, नवगीत, पांच स्तंभ, पिपासा, प्रसाद के नाटक आदि हैं। कुछ ऐसे भी साहित्य हैं जो अभी प्रकाशित होने हैं इनमें नहीं नाटक नहीं, वृत्त की भूमिका, टूटे दर्पण, महाराणा का महत्व, अपने घर का मेहमान आदि हैं। 1975 में इन्हें मीसा में ढ़ाई वर्ष का कारावास हुआ। इन्हें लोकतंत्र सेनानी की उपाधि भी मिली थी। साहित्य रचना के लिए इन्हें आचार्य चंद्रबली पांडेय साहित्य सम्मान, साहित्य गौरव, राष्ट्रीय साहित्य कला परिषद, वीमा सम्मान, टिक्कूराम कथूरिया, सेवा आदि के साथ उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान की ओर से रामविलास शर्मा पुरस्कार मिले थे। छह फरवरी को उनका 75वां जन्मदिन था और इसी दिन उनकी पुस्तक गोवर्धन का नेहरू हाल में विमोचन भी था। लेकिन दुर्भाग्य ही था कि पुस्तक के विमोचन से पूर्व ही उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया। गार्ड आफ आनर के साथ उन्हें वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर अंतिम संस्कार किया गया। पंडित पारसनाथ गोवर्धन के निधन से मर्माहत मुबारकपुर विधान सभा क्षेत्र के सपा कार्यकर्ताओं द्वारा गुरुवार को सठियांव स्थित सपा कार्यालय में शोक सभा का आयोजन किया गया। पूर्व अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा कि उनका जाना दु:खद है। इस मौके पर ज्याउल्लाह अंसारी महाप्रधान, मुकर्रम मलिक, राधेश्याम भारती, जितेंद्र कुमार, सोनू, गुल्लू, गौरव यादव, शोभनाथ यादव, रमेश, मासूम भाई, चंदन यादव आदि उपस्थित थे।