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शोक में डूबे शिया समुदाय के लोग, धारण किए काले लिबास

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मेजवां। इस्लामिक वर्ष का पहला महीना मुहर्रम मंगलवार से शुरू हो रहा है। मुस्लिम इलाकों में अजाखाने सजाए जा रहे हैं। कई स्थानों पर ताजिये बनाए जा रहे हैं। शिया समुदाय के लोग अभी से काले लिबास पहने नजर आने लगे है। मकानों पर काली पताकाएं लगने लगी हैं। रमजान का महीना आते ही लोगों में खुदा का मेहमान बनने की खुशी छा जाती है, ऐसे ही मुहर्रम आते ही लोगों का दिल दुखी और आंखें नम दिखाई देने लगतीं है। शिया धर्म गुरुओं का कहना है कि किसी भी धर्म के देवता पर इतना जुल्म सितम नहीं हुआ जितना मुहम्मद साहब के नवासे इमाम हुसैन पर हुआ। यह सितम मोहर्रम के महीने में ही हुआ। इस लिए यह महीना शुरू होते ही मुसलमान गम में डूब जाता है। इमाम हुसैन और यजीद के बीच इराक स्थित करबला के मैदान में 10 मुहर्रम सन 60 हिजरी में हुए इस जंग का अपना एक अलग महत्व है। इसमें छह माह के बच्चे से लेकर 86 साल के लोग लाखों की फौज का मुकाबला कर शहीद हो गए थे। शिया धर्म गुरु मौलाना फरहत हुसैन के मुताबिक चांद रात से ही मजलिसें शुरू हो जाती है। अजाखाने सजा दिए जाते हैं। इसमें गम की प्रतीक काली चादरें ही लगाई जाती हैं। अजाखानो में दिन-रात मजलिसें होती है। 10 मुहर्रम को ताजिया दफन किया जाता है। इसके बाद इमाम हुसैन का चेहल्लुम का जुलूस निकाला जाता है। यही से जुलूसों और अमारियों का सिलसिला शुरू होता है जो दो माह आठ दिन तक चलता है।
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