आजमगढ़। सपा और बसपा ने जिस उद्देश्य को लेकर उत्तर प्रदेश में गठबंधन किया, उसका असर भले न दिखा हो लेकिन जनपद में सिर्फ एक जनसभा से सपा व बसपा प्रमुख अखिलेश यादव और मायावती अपने वोटों को सहेजने में कामयाब रहे। इसका परिणाम रहा कि जनपद की दोनों सीटों पर गठबंधन ने कब्जा जमाया। वहीं पीएम मोदी और सीएम योगी अपनी जनसभा से मतदाताओं को अपने पक्ष में करने में नाकाम रहे।
जनपद की दोनों सीटें सपा और बसपा के बीच झूलती हैं। इन सीटों पर काफी दिनों से सपा और बसपा के प्रत्याशी के जीत हासिल करते रहे। सपा से बागी रमाकांत यादव ने भाजपा का दामन थामा और 2009 में आजमगढ़ लोकसभा सीट पर कमल खिलाया लेकिन 2014 में उन्हें मुलायम सिंह यादव से हार का सामना करना पड़ा। वहीं लालगंज लोकसभा सीट पर मोदी लहर में नीलम सोनकर ने पहली बार कमल खिलाया लेकिन 2019 में वह अपने इस करिश्मे को दोहरा नहीं सकी और बसपा की संगीता आजाद से हार गई। 2019 में जब आजमगढ़ संसदीय सीट पर भाजपा ने भोजपुरी सिने स्टार दिनेश लाल यादव निरहुआ को प्रत्याशी बनाया जो कि कार्यकर्ताओं को नागवार गुजरा लेकिन निरहुआ ने जिस सधे अंदाज से अपने अभिनेता से नेता बनने की ओर कदम बढ़ाया कि हर कोई उसका मुरीद हो गया। सीएम योगी आदित्यनाथ ने निरह़ुआ को जनपद से टिकट दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। निरहुआ की जीत के लिए उन्होंने 25 अप्रैल को खरिहानी में और नौ मई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मंदुरी में संयुक्त रूप से जनसभा की लेकिन उनका यह प्रयास नाकाफी साबित हुआ। हालांकि निरहुआ को मिला वोट पिछले लोकसभा चुुनावों में भाजपा प्रत्याशी को मिले वोटों से ज्यादा है। जनपद में पहली बार किसी भाजपा प्रत्याशी ने तीन लाख वोटों का आंकड़ा पार किया। वहीं सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव ने अपने समर्थन मेें दो जनसभाओं को संबोधित किया। पहली जनसभा उन्होंने बैठौली में उस समय की थी जब वह नामांकन करने के लिए आए थे। इसके बाद दूसरी जनसभा उन्होंने आठ मई को रानी की सराय चेकपोस्ट पर बसपा सुप्रीमो के साथ संयुक्त रुप से की। वोटों के बिखराव की आशंका के बीच मायावती और अखिलेश अपने वोटरों को बंटने से बचाने में कामयाब रहे।