आजमगढ़। प्रथम खड़ी हिंदी काव्य धारा के प्रणेता अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ की 153वीं जयंती के अवसर पर लोक मनीषा परिषद द्वारा पंडित अमर नाथ तिवारी के मड़या स्थित आवास पर सोमवार को साहित्यिक गोष्ठी का आयोजन किया गया। जिसमें साहित्य जगत से जुड़े लोगों ने उनके चित्र पर माल्यार्पण कर उनके व्यक्तिव और कृतित्व पर प्रकाश डाला।
मुख्य अतिथि डीएवी पीजी कॉलेज की हिंदी विभागाध्यक्ष डा. गीता सिंह ने कहा कि हरिऔध जी ने ‘विपत्ति के रक्षण सर्वभूत का, सहाय होना असहाय जीव का, उबारना संकट से स्वजाति को, यही मानव का सर्वप्रथम कृत्य है’। इन पंक्तियों के उद्गार से विश्व मैत्री की बात कहने वाले प्रथम कवि है। हिन्दी खड़ी भाषा के पक्षधर रहे और पहली बार मंगल-स्तुति रहित काव्य सृजन का श्रीगणेश किए। जिसका अनुशरण जयशंकर प्रसाद और गुप्त जी ने भी किया। मुख्य वक्ता जगदीश प्रसाद बर्नवाल कुंद ने प्रियप्रवास और वैदेही वनवास कृतियों को समाज सुधार के लिए हितैषी कहा। साहित्य में कवि, नाट्यकार, आलोचक, मुहावराप्रेषी आदि रहे। हिंदी की प्रसिद्ध प्रतिष्ठा में ठेठ हिंदी का ठाट अग्रणी कृति रही। डा. अखिलेश चंद्र ने हरिऔध के प्रिय प्रवास और वैदेही वनवास को अमरकृति कहा। पंडित जंमेजय पाठक ने कहा कि हरिऔध जी ने सर्वप्रथम देव या ईश्वर की अराधना से परे मानव को केंद्र में आदर्श मानकर अपनी रचना का विषय बनाया। इस अवसर पर डा. गीता सिंह ने अपनी संपादित पुस्तक ‘हरिऔध साहित्य में समाज और स्त्री’ पुस्तक कार्यक्रम के अध्यक्ष पंडित अमरनाथ तिवारी को भेंट की। इस मौके पर भूपेंद्र सिंह, राजकिशोर तिवारी, अभिलाष सोनकर, गिरिजा शंकर यादव, मोहन वर्मा, विजय कुमार पांडेय आदि उपस्थित रहे। संचालन निशीथ रंजन त्रिपाठी ने किया।