अयोध्या। ऑटिज्म से प्रभावित बच्चों के बेहतर विकास के लिए समाज में जागरूकता, समझ और सहयोग जरूरी है। समय पर इसकी जानकारी होने से इस बीमारी में तेजी से सुधार होता है। विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस से पूर्व मेडिकल कॉलेज के चिकित्सकों ने इससे बचाव व इलाज की जागरूकता को लेकर टिप्स भी साझा किए हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार ऑटिज्म एक न्यूरो-डेवलपमेंटल स्थिति है। इसका असर बच्चों के व्यवहार, संवाद और सामाजिक संपर्क पर पड़ता है। ऐसे बच्चों में सामान्य से अलग व्यवहार दिखता है। जिला अस्पताल और मेडिकल कॉलेज के मानसिक रोग व बाल रोग विभाग में इससे प्रभावित बच्चों की जांच, काउंसलिंग और थेरेपी की सुविधा उपलब्ध है।
मेडिकल कॉलेज के बाल रोग विभागाध्यक्ष डॉ. आनंद शुक्ला ने बताया कि ऑटिज्म एक विकासात्मक स्थिति है, जिसमें बच्चे की सीखने, बोलने और सामाजिक व्यवहार की क्षमता प्रभावित होती है। यह कोई बीमारी नहीं, बल्कि एक न्यूरोलॉजिकल अंतर है। शुरुआती अवस्था में पहचान होने पर बच्चों में सुधार की संभावनाएं काफी बढ़ जाती हैं। मेडिकल कॉलेज की ओपीडी में भी इस तरह के बच्चे प्राय: आते हैं।
ऐसे बच्चों के लिए नियमित थेरेपी और परिवार का सहयोग सबसे ज्यादा प्रभावी होता है। समय पर हस्तक्षेप से बच्चों के व्यवहार और सीखने की क्षमता में सुधार लाया जा सकता है। अभिभावक बच्चों के व्यवहार पर ध्यान दें। लक्षण दिखने पर विशेषज्ञ से संपर्क करें। बच्चों को सकारात्मक माहौल और प्रोत्साहन दें। परिवार, स्कूल और समाज के संयुक्त प्रयास से ऐसे बच्चों को बेहतर और आत्मनिर्भर जीवन दिया जा सकता है।
ऑटिज्म प्रभावित बच्चों के प्रमुख लक्षण
-आंखों से संपर्क बनाने में कठिनाई
-बोलने या समझने में देरी
-एक ही काम को बार-बार दोहराना
-सामाजिक गतिविधियों में कम रुचि
-अकेले रहना पसंद करना