अयोध्या। हजारों साल पुराने जिन वेदों-पुराणों और उपनिषद आदि प्राचीन ग्रंथों को हम पढ़ते या सुनते आए हैं, उन्हें वैज्ञानिक तथ्यों के साथ आसान तरीके से लोगों के सामने रखने और उनके आधार पर नए आविष्कार करने के लिए शोध किया जाएगा। संस्कृति विभाग इसके लिए केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय से एमओयू करने की तैयारी कर रहा है। विश्वविद्यालय से जुड़े वैदिक विद्वानों की सेवा एक्सपर्ट के रूप में ली जाएगी, जो वेद से संबंधित स्थलों, कथाओं आदि पर शोध करेंगे।
ऋग्वेद सहित विभिन्न वेद-ग्रंथों का हर श्लोक अपार ज्ञान समेटे हुए है, बस उसे समझकर उसके आधार पर शोध करने की आवश्यकता है। इसी को ध्यान में रखते हुए संस्कृति विभाग ने एक योजना तैयारी की है। इसके तहत जल्द ही केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय नई दिल्ली से एमओयू किया जाएगा। अंतरराष्ट्रीय रामायण वैदिक शोध संस्थान के सलाहकार आशुतोष त्रिपाठी बताते हैं कि केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के पूरे देश भर में कैंपस हैं। दिल्ली, जम्मू, कर्नाटक, नागपुर, अहमदाबाद आदि क्षेत्रों में जो कैंपस हैं, वहां से संस्कृत के विद्वानों का चयन किया जाएगा। ये विद्वान विशेषज्ञ के रूप में हमारे साथ जुड़ेंगे।
बताया कि कि संस्कृत का ज्ञान न होने के कारण वेद से संबंधित कुछ भ्रांतियां है, शोध के माध्यम से इन्हें दूर किया जाएगा। वेद में जो स्थान, कथाएं वर्णित हैं उन पर शोध का खाका तैयार हो रहा है। इसके लिए विशेषज्ञों की टीम तैयार की जाएगी। ये टीम कम से कम 100 शोधार्थी छात्रों को वेद से संबंधित अलग-अलग विषय पर शोध कार्य कराएगी। इस प्रस्ताव को शासन से मंजूरी मिली चुकी है, इसी माह एमओयू की प्रक्रिया पूरी कर योजना को आगे बढ़ाया जाएगा।
वेद भाष्यकार डॉ. देवी सहाय पांडेय दीप इस पहल का स्वागत करते हैं। वे कहते हैं कि वेदों में कई वैज्ञानिक रहस्य छुपे हैं। बताया कि आठ हजार साल पुराने ऋग्वेद के दसवें मंडल के 189वें उपमंडल में लिखे पहले ही मंत्र में इस बात का जिक्र है कि पृथ्वी अपने पिता के समान सूर्य के चारों और घूमती है और चंद्रमा अपनी माता के समान पृथ्वी के चारों और घूमता है। जबकि आज हमें पढ़ाया जाता है कि गैलीलियो ने इसकी खोज की थी। हमें अपने ग्रंथों के आधार पर आविष्कार करने की जरूरत है।