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Ayodhya News: राम मंदिर के शिखर पर लहराएगी रामराज की पताका

Fri, 14 Nov 2025 10:36 PM IST
लखनऊ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, अयोध्या
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38-राममंदिर परिसर में दर्शन को जाते श्रद्धालुगण
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नितिन मिश्र
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अयोध्या। राम मंदिर के शिखर पर 25 नवंबर को पीएम मोदी धर्मध्वज फहराकर न सिर्फ राम मंदिर की पूर्णता का संदेश देंगे, बल्कि यह रामराज के आगाज का भी शंखनाद होगा। जब राम मंदिर के शिखर पर रामराज की पताका लहराएगी तो उसके अर्थ केवल धार्मिक उत्सव तक सीमित नहीं रहेंगे। यह समाज के हर उस वर्ग की भागीदारी और जिम्मेदारी का प्रतीक बनेगी, जो सामाजिक समरसता और लोक कल्याण की नींव है।
श्रीराम 14 वर्ष बाद लंका विजय कर जब अयोध्या लौटे तो उनका भव्य राज्याभिषेक हुआ। इस राज्याभिषेक में हर वर्ग के मेहमान बुलाए गए थे। श्रीराम ने जिन दो मेहमानों को मुख्य रूप से आमंत्रित किया गया था, उनमें निषादराज व केवट ही थे। इसके अलावा वानरों के राजा सुग्रीव व जामवंत भी समारोह का हिस्सा बने थे। कुछ उसी तर्ज पर ध्वजारोहण समारोह की रूपरेखा विशेष रूप से समाज के आधारभूत स्तंभों को जोड़ने वाली है। शिक्षक, किसान, युवा, महिला समूह, सेवा कार्यों में जुटे स्वयंसेवक और वंचित समाज के प्रतिनिधि जब समारोह का हिस्सा बनेंगे तो रामराज की अवधारणा साकार होती दिखेगी।
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राम मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के समारोह में मेहमान के रूप में समाज के शीर्ष लोगों को आमंत्रित किया गया था, जबकि ध्वजारोहण समारोह में समाज की नींव के रूप में काम करने वाले बुलाए गए हैं। इनमें गिरिवासी, वनवासी, आदिवासी, केवट, ग्राम प्रधान, आम लोग शामिल हैं। राम मंदिर ट्रस्ट का मानना है कि रामराज की शक्ति इन्हीं वर्गों की प्रतिबद्धता में निहित है और ध्वजारोहण में उनकी उपस्थिति उस आदर्श समाज का संदेश देगी, जिसकी कल्पना श्रीराम ने अपने आचरण से की।

धार्मिक आयोजन, लेकिन राजनीतिक उप संकेत
राजनीतिक विश्लेषक डॉ़ बांके बिहारी मणि त्रिपाठी का मानना है कि समाज की नींव के रूप में काम करने वाले लोगों को ध्वजारोहण समारोह में आमंत्रित करना अप्रत्यक्ष रूप से पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक राजनीति का तोड़ है। सांस्कृतिक तौर पर यह रामराज को सामाजिक समरसता की आधुनिक परिभाषा में ढालने का प्रयास है। समारोह यह संदेश देगा कि धर्म के माध्यम से समाज में विभाजन नहीं, बल्कि एकता और समानता को बल दिया जा सकता है।
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आने वाली पीढि़यों के लिए दिशासूचक
धर्माचार्य जगद्गुरु रामदिनेशाचार्य ने कहा कि केवट, निषादराज से मिलन से लेकर वनवासी समाज, शबरी को सम्मान देने तक, और दीन-दुखियों के प्रति करुणा से लेकर राजधर्म की उच्चतम मर्यादा तक, श्रीराम ने जो प्रतिमान गढ़े, वही जीवंत होने जा रहा है। ध्वजारोहण का अर्थ केवल ध्वज फहराना नहीं, बल्कि धर्म, नीति, सेवा और समरसता के उस भाव को धारण करना है, जो स्वयं श्रीराम ने अपने आचरण से स्थापित किया। यह समारोह केवल एक उत्सव नहीं बल्कि मर्यादा, समन्वय और लोक कल्याण के उस आदर्श को सार्वजनिक रूप से पुन: प्रतिष्ठित करेगा, जो आने वाली पीढि़यों के लिए दिशासूचक बनने जा रहा है।

38-राममंदिर परिसर में दर्शन को जाते श्रद्धालुगण

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