अयोध्या। अवध विश्वविद्यालय में आयोजित 12 दिवसीय ऑनलाइन संकाय विकास कार्यक्रम (एफडीपी) के दूसरे दिन सतत पर्यावरण प्रबंधन विषय पर पारंपरिक जल संरक्षण प्रणालियों की महत्ता पर विस्तार से चर्चा की गई। कार्यक्रम का आयोजन विश्वविद्यालय के आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन प्रकोष्ठ (आईक्यूएसी) ने किया।
मुख्य वक्ता के रूप में पर्यावरण विज्ञान विभाग के प्रो. सिद्धार्थ शुक्ल ने राजस्थान के शुष्क क्षेत्रों में (टांका, जोहड़ और खड़ीन) जैसी तकनीकों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि ये प्रणालियां वर्षा जल को संरक्षित कर भूजल स्तर बनाए रखने में सहायक रही हैं। दक्षिण भारत में एरी प्रणाली का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि यह आपस में जुड़े टैंकों की शृंखला है, जिससे जल का समुचित वितरण संभव होता था। भारत में प्राचीन काल से ही भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप जल संचयन की विविध प्रणालियां विकसित की गई थीं, जो आज भी प्रासंगिक हैं। प्रो. शुक्ल ने उत्तर और मध्य भारत की बावड़ियों, तालाबों और पोखरों का उल्लेख करते हुए बताया कि ये केवल जल संचयन के साधन ही नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के केंद्र भी रहे हैं। इस अवसर पर आईक्यूएसी निदेशक प्रो. हिमांशु शेखर, डॉ. राकेश कुमार सहित बड़ी संख्या में शिक्षक एवं प्रतिभागी उपस्थित रहे।
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पारंपरिक जल संरक्षण की प्रभावी तकनीक
एरी दक्षिण भारत, विशेषकर तमिलनाडु में टैंकों की एक शृंखला होती है, जिसमें एक टैंक भरने पर पानी दूसरे में पहुंचता है, जिससे जल प्रबंधन और सिंचाई सुचारु रहती है। टांका राजस्थान में घरों या किलों के पास बना भूमिगत टैंक होता है, जिसमें वर्षा जल संग्रहित किया जाता है। जोहड़ मिट्टी या पत्थर से बना छोटा चेक डैम होता है, जो वर्षा जल को रोककर जमीन में समाहित करता है और भूजल स्तर बढ़ाने में मदद करता है।