अयोध्या। श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन और राम मंदिर निर्माण की कानूनी लड़ाई में करीब तीन दशक तक रामलला के पक्ष को मजबूती से रखने वाले स्वर्गीय पंडित त्रिलोकीनाथ पांडेय ‘राम सखा’ के परिवार ने अब उनके योगदान के सम्मान और स्थायी स्मृति के लिए श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का दरवाजा खटखटाया है। परिवार का कहना है कि जिन पंडित त्रिलोकीनाथ पांडेय ने अपने जीवन के 28 वर्ष रामलला के मुकदमे को समर्पित कर दिए, उनके परिवार और योगदान को अपेक्षित सम्मान अब तक नहीं मिल सका है।
राम सखा के पुत्र अमित पांडेय ने ट्रस्ट को भेजे मांगपत्र में उनके योगदान को मंदिर निर्माण के इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय बताते हुए तीन प्रमुख मांगें रखी हैं। पहली मांग श्रीराम मंदिर परिसर या मुख्य द्वार के सामने पंडित त्रिलोकीनाथ पांडेय ‘राम सखा’ की आदमकद प्रतिमा स्थापित करने की है। परिवार चाहता है कि राम जन्मभूमि के लिए उनके समर्पण की पहचान आने वाली पीढ़ियों तक बनी रहे।
दूसरी मांग परिवार के किसी सदस्य को श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में सदस्य के रूप में स्थान दिए जाने का आग्रह किया गया है। परिवार का तर्क है कि यह किसी व्यक्तिगत लाभ की मांग नहीं, बल्कि राम मंदिर आंदोलन में पंडित त्रिलोकीनाथ पांडेय के योगदान के सम्मान का प्रतीक होगा।
तीसरी मांग राम सखा के आश्रितों और शुभचिंतकों के लिए विशिष्ट दर्शन पास तथा प्रात:कालीन दर्शन की स्थायी व्यवस्था से जुड़ी है। परिवार चाहता है कि रामलला के प्रति जीवन समर्पित करने वाले राम सखा के परिवार और उनके निकट सहयोगियों को मंदिर में दर्शन के लिए विशेष सुविधा मिले। मामले में ट्रस्टी महंत दिनेंद्र दास ने कहा कि पत्र अभी मिला नहीं है। मिलने पर ट्रस्ट मांगों पर विचार करेगा। संवाद
कौन थे ‘राम सखा’ पंडित त्रिलोकीनाथ पांडेय
पंडित त्रिलोकीनाथ पांडेय ‘राम सखा’ राम जन्मभूमि से जुड़े लंबे कानूनी संघर्ष में रामलला के पक्ष से जुड़े प्रमुख विधिक योद्धाओं में रहे। रामजन्मभूमि की मुक्ति के लिए रामलला के सखा की हैसियत से सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति देवकीनंदन अग्रवाल ने साल 1989 में ही वाद दाखिल कर दिया था। उनको पक्षकार संख्या एक के तौर पर दर्ज किया गया था। साल 1996 में उनकी मृत्यु के बाद यह जिम्मेदारी बीएचयू के सेवानिवृत्त प्रफेसर ठाकुर प्रसाद वर्मा ने संभाली 2008 में उनके बाद रामलला के सखा का दायित्व त्रिलोकीनाथ पांडेय ने संभाला। त्रिलोकी नाथ ने 28 साल तक रामलला विराजमान की ओर से रामलला के सखा के तौर पर मुकदमा लड़ा था। इसी वाद पर राम मंदिर के हक में निर्णय भी आया था।