तारुन। खेती को अक्सर सहायक व्यवसाय माना जाता है लेकिन करनाईपुर के युवा किसान राजबहादुर वर्मा ने इसे मुख्य व्यवसाय बनाकर नई मिसाल पेश की है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से परास्नातक करने के बाद उन्होंने आधुनिक और प्राकृतिक खेती को अपनाया। करीब 22 बीघे में वह कद्दू, बींस, लहसुन, प्याज, गन्ना और केला की सहफसली खेती कर रहे हैं। कम लागत और प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग से वह लाखों रुपये का मुनाफा कमा रहे हैं।
वर्तमान में उन्होंने एक बीघे में 56 कद्दू प्रजाति की फसल लगाई है। इस प्रजाति की खासियत है कि एक पौधे में औसतन 56 तक फल लगते हैं। बताया कि अक्तूबर के अंतिम सप्ताह में बीकापुर से बीज लाकर केले की फसल के साथ मल्चिंग विधि से मेड़ों पर बोआई की। एक बीघे में लगभग 12 हजार रुपये की लागत आई। इससे अब तक करीब एक लाख रुपये की आमदनी हो चुकी है।
हर तीसरे दिन लगभग तीन क्विंटल कद्दू की तोड़ाई कर गोसाईगंज मंडी भेजा जाता है। इस समय मंडी में 43 रुपये प्रति किलो के भाव से कद्दू बिक्री हो रही है। सहालग के चलते मांग और बढ़ी है, हालांकि शुरुआती दौर में 15 रुपये प्रति किलो के भाव से भी बिक्री हुई थी। बताया कि केले की फसल में डाली गई लगभग 40 क्विंटल गोबर की खाद से ही कद्दू की फसल तैयार हो गई।
सिंचाई के अलावा अतिरिक्त खर्च नहीं आया। फसल को कीड़ों से बचाने के लिए नीम के तेल का प्रयोग किया गया। बीच में मौसम खराब होने पर फंगीसाइड दवा का छिड़काव करना पड़ा। राजबहादुर वर्मा बताते हैं कि बोआई के लगभग 50 दिन बाद बेल फैलने लगती है और फरवरी तक उपज मिलती रहती है।
सहफसली खेती से डबल मुनाफा
राजबहादुर गन्ने के साथ केला, गन्ने के साथ आलू और लहसुन की खेती कर अतिरिक्त लाभ कमा रहे हैं। केले की उन्नत कैडिला भीम प्रजाति के एक पौधे से लगभग 60 किलो तक उत्पादन मिल रहा है। एक बीघे में केले से करीब एक लाख रुपये की आय हो रही है। गन्ने की एक बीघे में लगभग 150 क्विंटल उपज मिलती है।
रोजगार भी दे रहे, कई पुरस्कारों से सम्मानित
खेती के इस मॉडल से प्रतिदिन छह मजदूरों को रोजगार मिल रहा है। राजबहादुर वर्मा को गन्ना शोध संस्थान लखनऊ से तीन बार अधिक उपज का पुरस्कार मिल चुका है। कुमारगंज विश्वविद्यालय से 12 बार सम्मानित किए जा चुके हैं। ब्लॉक स्तर पर भी कई पुरस्कार मिल चुके हैं। फरवरी माह में प्रदेश के कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही ने उनके खेतों का निरीक्षण कर फसलों की सराहना की थी।