अयोध्या। बिहार के चुनावी मैदान में इस बार केवल नारों की नहीं, बल्कि “जय सियाराम” की भी गूंज है। अयोध्या और बिहार के धार्मिक जुड़ाव ने संतों को राजनीति के केंद्र में ला दिया है। अयोध्या के कई मंदिरों के महंत मूलत: बिहार के ही रहने वाले हैं। यह संत-धर्माचार्य बिहार में डेरा डाले हुए हैं। कोई मंच से आशीर्वाद दे रहा है तो कोई रामराज्य की परिकल्पना समझा रहा है।
बिहार की जमीन पर धर्म और राजनीति का रिश्ता नया नहीं। राम मंदिर के निर्माण के बाद अयोध्या की आवाज का असर बढ़ा है। संत समाज का बिहार में सक्रिय होना खासतौर पर ग्रामीण और धार्मिक रूप से सक्रिय इलाकों में जनता की भावनाओं पर गहरा प्रभाव डाल सकता है। संतों का प्रचार प्रत्यक्ष रूप से वोट बैंक नहीं बदलता, लेकिन वातावरण जरूर बनाता है। बिहार की राजनीति में जहां जाति समीकरण अब भी प्रमुख हैं, वहीं “राम का नाम” उस समीकरण में एक भावनात्मक आयाम जोड़ रहा है। अयोध्या के एक दर्जन से अधिक संत इन दिनों बिहार की फिजा में जय श्रीराम का रस खोल रहे हैं।
राजनीतिक विशेषज्ञ रमापति पांडेय कहते हैं कि अयोध्या और बिहार का रिश्ता केवल भक्ति का नहीं, इतिहास का भी है। मिथिला के जनकपुरी और अयोध्या की जननी सीता के संबंध को संत धार्मिक एकता की नींव बता रहे हैं। संत सीधे वोट नहीं दिलाते, लेकिन माहौल बनाते हैं। उनकी वाणी से एक धार्मिक नैरेटिव तैयार होता है, जो खास वर्गों को प्रभावित करता है। मिथिलांचल और सीमांचल क्षेत्र में जनकपुरी और अयोध्या के भावनात्मक रिश्ते का सीधा असर देखा जा सकता है। गया, मुजफ्फरपुर और पटना के ग्रामीण इलाकों में मंदिर-आधारित सभाओं से धार्मिक मतदाताओं का ध्रुवीकरण संभव है।
राजनीति नहीं, राम नीति की परीक्षा है
जगद्गुरु परमहंसाचार्य भी बिहार में चुनावी मंचों पर दिख रहे हैं। वे कहते हैं कि बिहार की धरती पर राजनीति नहीं, राम नीति की परीक्षा है। बिहार की सियासत में इस बार मुद्दा केवल विकास नहीं, ‘धर्म की दिशा’ भी है। बिहार की जनता भावनाओं से जुड़ी है। जो राम का नाम लेगा, उसकी नैया पार लगेगी।
बिहार और अयोध्या का है अटूट रिश्ता
बिहार के मधुबनी जिले के मूल निवासी अभिराम दास ने वर्ष 1949 में बाबरी ढांचे में रामलला की मूर्ति रखी थी। मधुबनी मिथिला में है। मिथिला श्रीराम की ससुराल है। महंत परमहंस रामचंद्र दास राम मंदिर आंदोलन के महानायक और श्रीराम जन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष थे। वह भी बिहार (छपरा) के ही थे। बिहार का दूसरा अयोध्या कनेक्शन यह है कि 1989 में बिहार के ही कामेश्वर चौपाल ने राम मंदिर के शिलान्यास की पहली ईंट रखी थी। वह राम मंदिर ट्रस्ट के सदस्य भी रहे। एक अन्य कनेक्शन यह है कि विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष डाॅ. आरएन सिंह 22 जनवरी को रामलला की प्राण प्रतिष्ठा समारोह में मुख्य यजमान बने थे। पटना महावीर मंदिर की ओर से अयोध्या में नि:शुल्क राम रसोई 2019 से ही संचालित की जा रही है।
महंत बृजमोहन दास ने बताया कि हम बिहार में राम के थे, राम के हैं हम राम के रहेंगे...जैसे गीतों से माहौल बना रहे हैं। जो धर्म के मार्ग पर चलेगा, वही जनता के दिल तक पहुंचेगा। रामराज्य का मतलब जनता का राज है। जो राम के नाम का आदर करेगा, वही राज संभालेगा।