डॉ. बृजेश कुमार सिंह
अयोध्या। मानव जनित शोर और प्रकाश न केवल इंसानों के जीवन को प्रभावित कर रहा है, बल्कि यह कौवों की जीवनशैली पर भी असर डाल रहा है। इसके चलते कौवों के व्यवहार में परिवर्तन दर्ज किया गया है। वह नगरीय क्षेत्र में असहज और व्याकुल हो रहे हैं। यह बात अयोध्या के कामता प्रसाद सुंदरलाल साकेत स्नातकोत्तर महाविद्यालय के प्राणि विज्ञानियों के शोध में सामने आई है।
शोध के लिए कॉलेज के प्राणिविज्ञान विभाग के डॉ. प्रशांत कुमार व उनके सहयोगियों ने प्रयागराज नगरीय क्षेत्र के 12 स्थानों को चयनित किया। इसके लिए चयनित 12 स्थानों पर मानव जनित शोर व प्रकाश का कौवों के रहन-सहन तथा व्यवहार में आने वाले बदलाव पर अध्ययन किया गया। टीम ने इस शोध कार्य में कौवों के रूस्टिंग व्यवहार (रात्रि में कौवों का एक ही जगह पर सामूहिक विश्राम) के विभिन्न चरणों, जैसे- विश्राम स्थल पर आने की शुरुआत का समय, जब आधे कौवे आ गए, जब सारे कौवे आ गए तथा कौवे कितने समय तक आवाज करते रहे पर वातावरणीय दशाओं का अध्ययन किया। इसमें सूर्यास्त का समय, तापमान, आद्रता, प्रकाश की तीव्रता व ध्वनि प्रबलता का एक साथ प्रभाव देखा गया।
शोध में यह पाया गया कि कौवे विश्राम स्थल पर पहले की अपेक्षा जल्दी लौटना शुरू कर देते हैं, तथापि मानव जनित शोर तथा प्रकाश की वजह से पूरे कौवों को विश्राम स्थल तक आने में ज्यादा समय लग रहा है। इसके अतिरिक्त विश्राम स्थल पर होने के बावजूद कौवे ज्यादा देर तक आवाज करते रहते हैं। डॉ. प्रशांत के अनुसार इसका अर्थ यह है कि मानव जनित शोर और प्रकाश के कारण कौवे नगरीय क्षेत्रों में असहज और व्याकुल हो रहे हैं। शोध टीम में डॉ. प्रशांत के अलावा डॉ. अरविंद शर्मा, डॉ. अवधेश शुक्ला व डॉ. कविता पाल शामिल रहे। उन्होंने बताया कि यह शोध कार्य प्रतिष्ठित शोध पत्रिका जर्नल ऑफ एनवायरनमेंटल बायोलॉजी में प्रकाशित होने के लिए स्वीकृत हुआ है।
पितृपक्ष में कौवों का है विशेष महत्व
डॉ. प्रशांत के अनुसार कौवा पारिस्थितिकी, आर्थिक, सांस्कृतिक और धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण जीव है। पितृपक्ष आते ही इस जीव की चर्चा शुरू हो जाती है। हम आदर भाव से इस पक्षी को खाद्य सामग्री देते हैं, जो प्रचलित मान्यताओं के अनुसार हमारे पूर्वजों तक पहुंच जाता है। मानव जनित शोर और प्रकाश के कारण कौवों का व्यवहार प्रभावित होना चिंता की बात है।
शोधकर्ता डॉ. प्रशांत कुमार ने बताया कि कौवों के इस व्यावहारिक परिवर्तन में अन्य संज्ञानात्मक कार्य व्यवहारों का भी योगदान होने की प्रबल संभावना है। कौवों के अतिरिक्त कई अन्य जीव जंतु भी रूस्टिंग व्यवहार को प्रदर्शित करते हैं। अतः नगरीय क्षेत्रों में कौवे और अन्य जीव जंतुओं के सुचारु जीवनयापन और संरक्षण के लिए एक संतुलित, औचित्यपूर्ण मानवीय गतिविधियों की आवश्यकता है।
52-कौवों का आशियाना (फाइल फोटो)