अयोध्या। मंगल को जन्मे मंगल ही करते, मंगलमय हनुमान...। मंगलवार को हनुमान जी का दिन माना जाता है। रामनगरी की सिद्धपीठ हनुमानगढ़ी पर मंगलवार को आस्था की कतारें इसकी पुष्टि भी करती हैं। इस मंगलवार हम अयोध्या के एक ऐसे मंदिर के बारे में बताते हैं जहां बजरंगबली की पूजा देवी (स्त्री) के रूप में की जाती है। सरयू तट स्थित कालेराम मंदिर में बजरंगबली की दक्षिणमुखी कृष्ण रंग की मूर्ति स्थापित है। उनका रोजाना 16 शृंगार होता है। उनकी हाथ में गदा की जगह कटार सज्जित है। अहिरावण उनकी चरणों में पड़ा है।
अयोध्या धाम के राम की पैड़ी पर स्थित कालेराम मंदिर में हनुमान जी स्त्री रूप में विराजमान हैं। इसका प्रमाण कृतिवासी रामायण, स्कंद पुराण एवं आनंद रामायण के सारखंड की कथा में मिलता है। इसके अनुसार हनुमान जी ने अहिरावण के वध के समय माता का रूप धारण करके राम जी और लक्ष्मण जी को मुक्त कराया था। कालेराम मंदिर में अति प्राचीन एक ही कसौटी के पत्थर में राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न के साथ माता सीता विराजमान हैं। मुख्य गर्भगृह के ठीक सामने कसौटी के पत्थर में ही हनुमान जी की प्रतिमा स्त्री रूप में विराजमान है। महत्वपूर्ण यह है कि हनुमानजी भी काले रूप में हैं।
हनुमान जी और अहिरावण से जुड़ा एक प्रसंग है। अहिरावण ने श्रीराम और लक्ष्मण का हरण कर लिया। बंदी बनाकर किसी गुप्त स्थान पर ले गया था। विभीषण ने हनुमान जी को अहिरावण के गुप्त स्थान के बारे जानकारी दी। विभीषण ने हनुमान जी को बताया कि अहिरावण मां भवानी का भक्त है और उसने पांच दिशाओं में पांच दीपक जलाए हैं। जब ये पांचों दीपक एक साथ बुझेंगे, तब ही अहिरावण की शक्तियां खत्म होंगी। हनुमान ने मां काली का रूप धारण कर अहिरावण का वध किया था। तब से उनकी पूजा देवी रूप में भी की जाने लगी।
मंदिर के पुजारी भालचंद देश पांडेय बताते हैं कि मंदिर में स्थापित राम, सीता, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न और हनुमान जी कि मूर्तियों को लेकर मान्यता है कि इन्हें विक्रमादित्य ने दो हजार वर्ष पहले स्थापित किया था। 1528 के आसपास बाबर की सेना ने अयोध्या में जन्मभूमि पर आक्रमण किया तो तत्कालीन पुजारी श्यामानंद ने भगवान के विग्रह को बचाने के लिए सरयू नदी में प्रवाहित कर दिया था। यह विग्रह 1748 के आसपास सरयू किनारे सहस्त्र धारा के पास महाराष्ट्रीयन संत नरसिंह राव मोघे को मिला। मान्यता है कि मूर्ति के मिलने से पहले नरसिंह राव को तीन बार स्वप्न में सरयू में मूर्ति होने की जानकारी हुई। स्वप्न में ही मिले आदेश के बाद जब वे सरयू नदी के पास पहुंचे तो उन्हें मूर्ति मिली। इसके बाद सभी मूर्तियों को सरयू किनारे उन्होंने स्थापित किया।