अयोध्या। डॉ़ राम अवतार एक ऐसे शोध यात्री हैं जिन्होंने राम जी के 291 तीर्थों को एक सूत्र में पिरोकर भारतीय सभ्यता और संस्कृति के भूले बिसरे इतिहास को जीवंत कर दिया है। अपनी 50 वर्ष की शोधयात्रा में डॉ़ राम अवतार ने जहां-जहां चरण पड़े रघुवर के...यानी राम वनगमन मार्ग के ऐसे-ऐसे स्थलों की खोज की है जो सनातन संस्कृति के लिए हीरे-मोती की तरह कीमती हैं।
अमर उजाला से बात करते हुए उन्होंने अपनी शोध यात्रा की कहानी सुनाई। बताया कि इन सभी प्राचीन स्थलों की खोज एक बार में संभव नहीं हो सकी है। 50 साल से यह खोज जारी है। पहले प्रयास में उन्होंने 124 स्थल खोजे थे। दूसरे में यह संख्या बढ़कर 128 पहुंच गई। तृतीय-चतुर्थ संस्करण में 196 स्थलों की खोज पूरी हुई। पांचवीं बार के प्रयास में यह संख्या बढ़कर 214 पहुंची। छठी व सातवीं बार जब शोध यात्रा की तो 294 तीर्थ स्थलों की खोज पूरी हुई। इन स्थलों की पुष्टि के लिए वे बार-बार एक ही स्थल पर गए हैं। रामायण में घटित 100 प्रमुख घटनाओं की सूची बनाई। एक स्थान से दूसरे स्थान को जोड़ने के प्रसंगों पर बार-बार विचार कर इन्हें प्रामाणिक स्थल के रूप में दर्ज किया है।
ये स्थल मुख्य रूप से दो वर्ग में चिन्हित किए गए हैं। पहले वर्ग में मुनि विश्वामित्र के साथ तत्कालीन अयोध्या से मिथिला अर्थात वर्तमान जनकपुर से अयोध्या के बीच कुल 41 स्थानों को रखा गया है। दूसरे वर्ग में श्रीराम वनगमन तीर्थ के रूप में 250 स्थल को चिन्हित किया गया है। इस तरह कुल 291 स्थल राम जी के ऐतिहासिक प्रमाण के रूप में स्वीकार किए गए हैं। डॉ़ राम अवतार का शोध इस मायने में महत्वपूर्ण हैं कि उन्होंने वाल्मीकि रामायण के भौगोलिक उल्लेख के साथ तालमेल बिठाते हुए रामजी के लीला स्थलों की खोज की है। प्रत्येक स्थान पर लोक संस्कृति में प्रचलित परंपरा और जन विश्वास की छानबीन की है।
डॉ़ राम अवतार ने बताया कि राम के वनवास का 80 फीसदी मार्ग नदियों के किनारे थे। रामायण में छह-सात नदियों का ही जिक्र मिलता है, लेकिन वनवास मार्ग पर 40 से अधिक छोटी-बड़ी नदियों की खोज उन्होंने अपनी शोध यात्रा में की हैं। बताया कि वनवास मार्ग में सरयू, तमसा, विसुही, गोमती, गंगा, यमुना, वाल्मीकि नदी, मंदाकिनी, बाघी नदी, गुप्त गोदावरी, नर्मदा, गोदावरी, कुंडलिनी, सोनभद्र, इंद्रावती, शबरी, भीमा, राम नहर, तुंगभद्र सहित अन्य नदियों की मौजूदगी थी।