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Build 2026 Lucknow: विशेषज्ञ बोले- स्वच्छ वायु सर्वेक्षण में लखनऊ प्रथम, तेजी से सुधरी हवा की गुणवत्ता

Fri, 09 Oct 2026 01:02 PM IST
Akash Dwivedi डिजिटल डेस्क, लखनऊ

सार

लखनऊ में बिल्ड इंफ्रास्ट्रक्चर कॉन्क्लेव में विशेषज्ञों ने वायु गुणवत्ता सुधार, प्रदूषण नियंत्रण और नवीकरणीय ऊर्जा पर चर्चा की। वक्ताओं के अनुसार, स्वच्छ वायु सर्वेक्षण में लखनऊ को प्रथम पुरस्कार मिला है। सौर ऊर्जा, जैव ऊर्जा और कृषि अपशिष्ट से ऊर्जा उत्पादन को बढ़ावा देकर प्रदूषण घटाने और औद्योगिक विकास को गति देने पर जोर दिया गया।

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लखनऊ में बिल्ड इंफ्रास्ट्रक्चर कॉन्क्लेव में विशेषज्ञ। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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लखनऊ में अमर उजाला बिल्ड इंफ्रास्ट्रक्चर कॉन्क्लेव में उत्तर प्रदेश के विकास की दिशा पर मंथन जारी है। स्वास्थ्य, एक्सप्रेसवे, ऊर्जा, औद्योगिक निवेश, रियल एस्टेट, एमएसएमई और लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों पर विशेषज्ञ चर्चा कर रहे हैं। इस मौके पर विशेषज्ञ संजीव सिंह और राजेश कुमार ने कहा कि शहरी क्षेत्रों में वाहनों से होने वाला उत्सर्जन वायु प्रदूषण का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। भारत स्टेज उत्सर्जन मानकों को क्रमिक रूप से सख्त करने से वाहनों से निकलने वाले प्रदूषकों को नियंत्रित करने में मदद मिली है।

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उन्होंने कहा कि पुराने और नए वाहनों के उत्सर्जन में अंतर को समझना जरूरी है। उत्सर्जन मानकों में सुधार से वायु प्रदूषण को कम करने में योगदान मिला है। हालांकि, अलग-अलग शहरों में इसका वास्तविक प्रभाव वाहनों की संख्या, यातायात, ईंधन के प्रकार और स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

 

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सौर और जैव ऊर्जा से पारंपरिक ईंधन पर निर्भरता घटाने का प्रयास

उन्होंने कहा कि पिछले एक दशक में ऊर्जा की खपत में काफी वृद्धि हुई है। इसके बावजूद सौर ऊर्जा और जैव ऊर्जा जैसे वैकल्पिक स्रोतों के विस्तार से पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों पर निर्भरता कम करने की संभावनाएं बढ़ी हैं।

सात वर्षों में सुधरी हवा की गुणवत्ता

उत्तर प्रदेश के शहरों में वायु गुणवत्ता सुधारने के लिए किए जा रहे प्रयासों का असर अब दिखाई देने लगा है। लखनऊ को इस वर्ष स्वच्छ वायु सर्वेक्षण में प्रथम पुरस्कार मिलना इसका उदाहरण है। पिछले सात वर्षों में शहर की वायु गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। स्वच्छ ईंधन, वाहनों से होने वाले उत्सर्जन पर नियंत्रण और नवीकरणीय ऊर्जा के बढ़ते इस्तेमाल जैसे उपायों ने प्रदूषण कम करने में योगदान दिया है। हालांकि, मौसम संबंधी परिस्थितियां अब भी वायु प्रदूषण की गंभीरता को प्रभावित करती हैं।

अमर उजाला के मंच पर चर्चा के दौरान वक्ता ने कहा कि गाजियाबाद समेत राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के शहरों में भी वायु प्रदूषण को समझने के लिए मौसम संबंधी परिस्थितियों को ध्यान में रखना जरूरी है। उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में तापमान व्युत्क्रमण (टेंपरेचर इनवर्जन) की स्थिति बनने पर प्रदूषक जमीन के पास जमा हो जाते हैं। हवा की गति कम होने से उनका फैलाव नहीं हो पाता और शहरों में प्रदूषण का स्तर बढ़ जाता है।

 

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बेहतर मॉनिटरिंग से सामने आ रही प्रदूषण की वास्तविक स्थिति

उन्होंने कहा कि पहले वायु गुणवत्ता की निगरानी का नेटवर्क इतना विकसित नहीं था और लोगों में भी प्रदूषण को लेकर जागरूकता कम थी। अब निगरानी व्यवस्था बेहतर हुई है और स्वच्छ हवा को लेकर लोगों की अपेक्षाएं भी बढ़ी हैं। इस वजह से प्रदूषण के आंकड़ों की तुलना करते समय निगरानी व्यवस्था में आए बदलावों को भी ध्यान में रखना चाहिए।

उन्होंने कहा कि शहरों में आबादी, वाहनों और उद्योगों की संख्या बढ़ने के साथ ऊर्जा की खपत भी बढ़ी है। इसके बावजूद यदि वायु गुणवत्ता में सुधार दिखाई दे रहा है तो इसके पीछे प्रदूषण नियंत्रण के लिए किए गए उपायों की भूमिका को समझना जरूरी है।

सौर ऊर्जा और बायोगैस उत्पादन पर जोर

पैनल डिस्कशन के चर्चा में सामने आया कि उत्तर प्रदेश अब नवीकरणीय ऊर्जा, कंप्रेस्ड बायोगैस (सीबीजी) उत्पादन और औद्योगिक निवेश के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है। कृषि अपशिष्ट से ऊर्जा उत्पादन की अपार संभावनाएं हैं। वहीं, गोरखपुर में करीब 25 हजार करोड़ रुपये के निवेश से कई परियोजनाओं की योजना बनाई जा रही है। प्रदेश में पहली बार लौह अयस्क का खनन कर उससे स्टील उत्पादन तक का एकीकृत तंत्र विकसित करने की दिशा में भी काम हो रहा है। 
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