अयोध्या। रामनगरी की प्रतिष्ठित पीठ रामायणम आश्रम में रविवार को पंडित राम किंकर सम्मान समारोह से तीन विभूतियों को अलंकृत किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि अध्यात्म व धर्म के मर्मज्ञ महंत मिथिलेश नंदिनी शरण ने कहा कि त्रिलोक में कोई राजा और राजधानी है तो उसका एक ही मॉडल है वह है अयोध्या। जब सब राजधानियां ढह जाएंगी, तब भी यह राजधानी (अयोध्या)रहेगी।
उन्होंने कहा कि लीला में पर्दा बदलता रहता है, राजा तो केवल राम हैं। तुलसी दास ने भी कहा है राजा राम, अवध राजधानी...। भगवान श्रीराम ने अपने पुत्रों को पकड़कर सिंहासन पर नहीं बिठाया। पैतृक राजधानी मिल जाए तो वह राजा नहीं, राजा वही है जो अपने पौरुष से राजधानी रचे। रामजी ने कभी समर्थन की चिंता नहीं की। सारी अयोध्या उन्हें वन जाने से रोक रही थी, उनके समर्थन में थी, लेकिन उन्होंने समर्थन की चिंता नहीं की।
मिथिलेश नंदिनी ने कहा कि पद्मभूषण राम किंकर ने रामचरित मानस की असाधारण, मौलिक व नवीन व्याख्या की। गोस्वामी तुलसीदास के अनुबंध को समझे बिना यह संभव नहीं था। गोस्वामी के एक-एक शब्द मोती हैं। इन मोतियों की माला बनाने वाले के पास रामचरित मानस जैसा धागा होना चाहिए। वरिष्ठ साहित्यकार यतींद्र मिश्र ने कहा कि अयोध्या की मिट्टी में तुलसी की वाणी और राम किंकर की तपस्या की सुगंध है। रामकिंकर की वाणी में जो मर्यादा थी, वह आज के समाज की जरूरत है। अयोध्या ने हमेशा यह सिखाया है कि आदर्श केवल कहे नहीं जाते, जिए जाते हैं।
साहित्यकार यतींद्र मिश्र ,महेंद्र मोहन व कैबिनेट मंत्री सुनील शर्मा को आश्रम की परमाध्यक्ष मंदाकिनी रामकिंकर ने रामकिंकर सम्मान से सम्मानित किया गया। महेंद्र मोहन व सुनील शर्मा कतिपय कारणों से समारोह में नहीं पहुंच सके। इसके अलावा एनसीबीटी-औरंगाबाद के डायरेक्टर हर्षवर्धन जाजू को भी सम्मानित किया गया। संचालन आत्मा राम व दीपक गुहा ने संयुक्त रूप से किया।
मानस को पाठ्य तो बना दिया, प्रयोग बनाना बाकी : मंदाकिनी
रामायणम आश्रम की परमाध्यक्ष मंदाकिनी रामकिंकर ने कहा कि रामचरित मानस सनातन धर्म की निधि तो है, अब संपूर्ण विश्व की एक अमूल्य धरोहर घोषित हो चुकी है। मानस का प्रत्येक शब्द मंत्रात्मक है। हमारी चिंता जेन-जेड यानी युवा पीढ़ी है। मानस को पाठ्य तो बना दिया है, प्रयोग बनाना बाकी है। मानस को ह्रदयागंम करने की जरूरत है। सद्गुरुदेव ने रामचरित मानस व महाभारत के बीच का अंतर बताते हुए कहा है कि महाभारत घर-घर होती है, रामचरित मानस को घर-घर होना चाहिए।