गुरुदत्त सिंह- 1949 में गुरुदत्त सिंह फैजाबाद के सिटी मजिस्ट्रेट थे। गुरुदत्त सिंह और अभिराम दास ने कई बार कहा कि उन्हें स्वप्न में मस्जिद के मुख्य गुंबद के नीचे भगवान श्रीराम दिखाई दिए। यह भी कहा जाता है कि 23 दिसंबर 1949, को जब मस्जिद में मूर्तियां रखी गईं, तो गुरुदत्त सिंह ने पूजा-अर्चना की थी। बाद के वर्षों में गुरुदत्त जनसंघ का प्रमुख चेहरा बने और आरएसएस उन्हें पहले कारसेवक के तौर पर सम्मानित करती है।
केके नायर- 1949 में केके नायर फैजाबाद के जिलाधिकारी थे। मस्जिद में मूर्तियां स्थापित होने के बाद सांप्रदायिक सद्भाव बिगड़ने को लेकर जब तत्कालीन पीएम नेहरू ने यूपी के तत्कालीन सीएम गोविंद बल्लभ पंत को लिखा, तो नायर ने मूर्तियां हटाने का जोरदार विरोध किया। इसके बाद उन्हें और सिटी मजिस्ट्रेट गुरुदत्त सिंह को हटा दिया गया। बावजूद इसके नायर डिगे नहीं। वह जनसंघ में शामिल हुए और 1967 में बहराइच से सांसद बने।
उमेश चंद्र- फैजाबाद में वकील और पत्रकार के तौर पर उमेश चंद्र पांडेय खबरों की रिसर्च को लेकर अयोध्या विवाद से जुड़े रहे। जनवरी 1986 में फैजाबाद जिला अदालत में याचिका दायर कर विवादित स्थल खोलने की मांग की। एक फरवरी को जिला जज केएम पांडेय ने वर्ष 1949 से पड़े तालों को खोलने का आदेश दिया। आदेश के 40 मिनट बाद ही ताले खोल दिए गए और राम मंदिर आंदोलन एक बार फिर चर्चा में आ गया।
गोपाल सिंह- एक वकील और हिंदू महासभा अयोध्या के सचिव गोपाल सिंह विशारद ने 1949 में मूर्तियां रखने के बाद वहां से हटाने पर कोर्ट में याचिका दायर की कि हिंदुओं को वहां पूजा करने का अप्रतिबंधित अधिकार है। उनकी याचिका रामजन्मभूमि मुकदने की शुरुआत थी।
भास्कर दास- 2017 में भास्कर दास का जब निधन हुआ, तब वह निर्मोही अखाड़ा के प्रमुख थे। वह रामजन्मभूमि मुकदमे के प्रमुख वादी थे। उनके अखाड़े ने विवादि ढांचे पर चबूतरा बनाए रखा। महज 30 वर्ष की उम्र में उन्होंने वर्ष 1959 में फैजाबाद में राम जन्मस्थान के संरक्षक के रूप में याचिका दायर करते हुए दावा किया कि बाबरी मस्जिद, मंदिर की जगह पर खड़ी है।