अयोध्या। मणिपर्वत के निकट वर्ष 1940 में स्थापित श्रीरामग्रंथागार पुस्तकालय का सुंदरीकरण पर्यटन विभाग 1़ 50 करोड़ की लागत से करा रहा है। इस पुस्तकालय में संरक्षित 15 हजार से अधिक प्राचीन दुर्लभ धर्मग्रंथों को सहेजने के लिए नवीन पुस्तकालय का भी निर्माण कराया जा रहा है। श्रीरामग्रंथागार की स्थापना अयोध्या के प्रकांड विद्वान महंत रामकुमार दास ने की थी।
उनके संपूर्ण जीवन की कमाई श्रीरामग्रंथागार में रखी है। उसके समकक्ष गीता प्रेस को छोड़कर शायद ही कोई ग्रंथागार हो। अनोखी अनुपलब्ध पुस्तकें, ग्रंथ और प्राचीन पांडुलिपियां यहां उपलब्ध हैं। पंडित रामकुमार दास अयोध्या के ऐसे एकलौते संत हैं, जिन्हें उनके आश्रम पर स्वयं जाकर अवध विश्वविद्यालय ने डी-लिट की मानद उपाधि दी थी। महंत रामकुमार दास के साकेतवास के बाद इस ग्रंथागार का संरक्षण नहीं हो सका। ग्रंथागार में संरक्षित ग्रंथों को दीपक चट करने लगे। ग्र्रंथागार के छह कमरे ग्रंथाें से भरे हैं। ग्रंथों को चूहे कुतर रहे हैं। इस पौराणिक धरोहर के संरक्षण के लिए रामनगरी के संतों ने भी आवाज उठाई थी।
ग्रंथागार के संरक्षण को लेकर दो साल से प्रयासरत संदीप कुमार ने बताया कि अब जाकर उनका संघर्ष पूरा हुआ है। पर्यटन विभाग उस परिसर का सुंदरीकरण करा रहा है, जहां ग्रंथागार स्थित है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा मंगलवार को यहां पंडित रामकुमार की मूर्ति की भी स्थापना की गई है। जल्द ही भव्य पुस्तकालय में दुर्लभ ग्रंथों को सुरक्षित रखा जाएगा, ताकि भावी पीढि़यां इसका लाभ उठा सकें।
ग्रंथागार में है इन दुर्लभ ग्रंथों का संग्रह
श्रीरामग्रंथागार में पंडित रामकुमार दास की रचित श्रीरामचरित मानस मूल शुद्ध पाठ, मानस के महर्षि 36 ऋषियाें की कथा, श्रीराम चरित रत्न मंजूषा, खंड काव्य धन्य जटायु, वैष्णव साधना नियमावली, श्रीराम रण क्रीड़ा, श्रीरामजन्मभूमि, बलिदानी वीरों की गाथा, श्रीराम चरित्र के तीन क्षेपक, श्री सीता चालीसा, श्री हनुमान चालीसा संशोधित, श्री हनुमत स्त्रोत प्रेत निवारक, श्रीरामानंद चालीसा, श्री तुलसीदास चालीसा सहित करीब 15000 ग्रंथ हैं। इसके अलावा तीन सौ साल पुरानी 700 हस्तलिखित पांडुलिपियां भी रखी हैं। कुछ पांंडुलिपियों को दीपक ने चट कर दिया है।