अयोध्या। आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, कुमारगंज के खेत परीक्षण में काले चने की पैदावार बढ़ाने में जिंक और बोरॉन के प्रभाव सामने आए हैं। कॉलेज ऑफ एग्रीकल्चर के मृदा विज्ञान एवं कृषि रसायन विभाग ने रबी सीजन में यू. शेखर-2 किस्म पर 12 प्रयोग किए, जिन्हें तीन-तीन बार दोहराया गया।
फास्फोरस, गंधक, जिंक सल्फेट और बोरॉन की अलग-अलग मात्रा का इस्तेमाल हुआ। एक प्रयोग में 60 किलो फास्फोरस, 40 किलो गंधक, 10 किलो जिंक सल्फेट प्रति हेक्टेयर और बोरॉन के 0.3 प्रतिशत घोल का पत्तियों पर छिड़काव किया गया। बिना जिंक-बोरॉन वाले खेत में 866.40 किलो प्रति हेक्टेयर उपज मिली, जबकि इनके प्रयोग से 996.01 किलो, यानी 129.61 किलो अधिक चना मिला।
दूसरे प्रयोग में सर्वाधिक 998.43 किलो प्रति हेक्टेयर उपज दर्ज हुई। 60 किलो फास्फोरस, 40 किलो गंधक, जिंक सल्फेट और बोरॉन वाले प्रयोग में कुल आय 79,117 रुपये और लागत के बाद बचत 41,029 रुपये प्रति हेक्टेयर रही। वैज्ञानिकों ने बाजार भाव व मौसम से आय बदलने की बात कही। किसान मिट्टी जांच और विशेषज्ञ सलाह के बाद ही खाद की मात्रा तय करें।
इनसेट
एक माह तक बुआई बेहतर
जेनेटिक्स एंड प्लांट ब्रीडिंग विभाग के प्रो. (डॉ.) शिवनाथ ने बताया कि चने की बुवाई के लिए 15 अक्तूबर से 15 नवंबर तक का समय सबसे अच्छा है। बुवाई से पहले खेत में अधिक पानी न हो। शुरू में खेत को खरपतवार से साफ रखें और जरूरत के हिसाब से पोषक तत्व दें। फूल आने से पहले निगरानी जरूरी है। जिंक या बोरॉन का छिड़काव मिट्टी जांच के बाद ही करें, इससे खर्च बचेगा और पैदावार सुधरेगी।