अयोध्या। समाज में परिवर्तन की सबसे मजबूत धुरी यदि कोई है तो वह महिला है। घर की चौखट से लेकर शिक्षा, स्वास्थ्य, कानून, सामाजिक सेवा, कला, खेल और आत्मनिर्भरता तक हर क्षेत्र में महिलाएं अपनी क्षमता और संकल्प से नई पहचान बना रही हैं। जब तक महिलाओं को समान अवसर, सुरक्षित वातावरण और निर्णय लेने की स्वतंत्रता नहीं मिलेगी, तब तक वास्तविक सशक्तीकरण अधूरा रहेगा। इसके लिए महिलाओं के साथ-साथ पुरुषों की सोच में बदलाव और समाज की सकारात्मक भागीदारी भी जरूरी है।
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर आयोजित संवाद में रामनगरी के विभिन्न तबके से जुड़ी महिलाओं ने बेबाक अपनी राय रखी। इनका कहना था कि परिवार में सबसे महत्वपूर्ण इकाई महिला होती है। इसलिए उनके स्वास्थ्य और मानसिक संतुलन का ध्यान रखना बेहद जरूरी है। महिलाओं को अपनी बात खुलकर कहने का अवसर और घर में सकारात्मक वातावरण मिलना चाहिए। कई समस्याओं का समाधान काउंसिलिंग से भी निकल सकता है, इसलिए कानूनी और मानसिक काउंसलिंग की व्यवस्था मजबूत होनी चाहिए। महिलाओं की योग्यता किसी से कम नहीं है, लेकिन उन्हें कई क्षेत्रों में अभी भी समान दर्जा नहीं मिल पाया है। उदाहरण के तौर पर महिलाओं को किसान का दर्जा नहीं दिया जाता। जब महिलाएं आर्थिक रूप से स्वावलंबी होंगी और निर्णय लेने की शक्ति उनके पास होगी तभी वास्तविक सशक्तीकरण संभव होगा। वन स्टॉप सेंटर जैसे संस्थानों को शहर के केंद्र में होना चाहिए ताकि जरूरतमंद महिलाओं को आसानी से सहायता मिल सके।
एक दिन नहीं बल्कि हर दिन मिले सम्मान
महिला दिवस केवल एक दिन का नहीं, बल्कि हर दिन महिलाओं के सम्मान का होना चाहिए। जब तक महिलाएं शिक्षित, आत्मनिर्भर और निर्णय लेने में सक्षम नहीं होंगी, तब तक सशक्तीकरण अधूरा रहेगा। सुरक्षा के लिए किशोरियों और युवतियों को ताइक्वांडो व अन्य आत्मरक्षा प्रशिक्षण दिए जाने चाहिए। महिलाओं के मुद्दों को उठाने के लिए जागरूकता समूह बनाए जाने चाहिए। कई बार आपातकालीन सेवाओं से संपर्क में देरी होती है, इसलिए उनकी कार्यप्रणाली को और तेज करने की जरूरत है। कॉलेजों में निशुल्क सेल्फ-डिफेंस प्रशिक्षण और सुरक्षित रूट मैप जैसी व्यवस्थाएं भी होनी चाहिए।
ऑनलाइन सुरक्षा को प्राथमिकता देना जरूरी
सोशल मीडिया पर हर मुस्कुराता चेहरा सच्चा नहीं होता। अनजान लोगों से बातचीत करने से पहले उनकी पहचान जरूर जांचें। थोड़ी सी सावधानी बड़ी परेशानी से बचा सकती है, इसलिए ऑनलाइन सुरक्षा को प्राथमिकता देना जरूरी है। महिलाओं की सुरक्षा के लिए पुरुषों की सोच में बदलाव जरूरी है। घर और स्कूल से ही बच्चों को यह शिक्षा दी जानी चाहिए कि हर महिला का सम्मान करें और जरूरत पड़ने पर उसकी मदद के लिए आगे आएं।
इनकी रही भागीदारी
ज्योत्सना श्रीवास्तव (अधिवक्ता), डॉ. कल्पना कुशवाहा, पल्लवी वर्मा (समाजसेवी), साक्षी तिवारी, एकता सिंह, मेनका सिंह, निधि श्रीवास्तव, सृष्टि तिवारी, सीमा तिवारी (योग एक्सपर्ट), एकता पांडेय, प्रज्ञा गुप्ता, अनिता द्विवेदी, मालती यादव, खुशबू साही।