बेमौसम बारिश ने खेतिहरों के साथ ही खेतिहर मजदूरों के सामने भी संकट खड़ा कर दिया है। जिन लोगों ने दूसरों के खेत को बटाई- बलकट पर लेकर तीन माह मेहनत किया उन पर दोहरी मार पड़ेगी। एक तो उन्हें मुआवजा नहीं मिलेगी, दूसरी तरफ उनकी लागत भी डूब गई है।
दूसरे के खेत को बटाई पर लेकर खेती करने वालों को कर्मकार कृषि श्रमिक की श्रेणी में रखआ गया है। जिले में वर्ष 1991 की जनगणना में जनसंख्या के आर्थिक वर्गीकरण की रिर्पोर्ट में 173184 किसानों के सापेक्ष 48367 कृर्षि श्रमिक थे।
2001 की जनगणना में 163459 किसानों के सापेक्ष कृषि श्रमिकों की संख्या 42088 थी। वर्ष 2011 की जनगणना में 144778 किसानों के सापेक्ष 89913 कृषि श्रमिक हैं। यह कृषि श्रमिक दूसरों की खेती आधा अथवा तिहाई बटाई और बलकट(लीज यानि किराए) पर लेकर अपनी पूंजी से फसल उत्पादन करते हैं।
कृषि श्रमिकों पर मार्च और अप्रैल में हुई बेमौसम बारिश कहर बनकर टूटी है। शासन व प्रशासन की निगाह बेमौसम बारिश से फसली नुकसान की जद में आए कृषि श्रमिकों तक नहीं पहुंच पा रही है।
कैसे होंगे खर्च पूरे-बाबूजी के गुजरने के बाद मां और दो बच्चों के परिवार का बोझ सिर पर है। पैसे नहीं थे, इसलिए डेढ़ बीघा खेत ही तिहाई बटाई पर रखे थे। बारिश ने फसल चौपट कर दी है। खाद, बीज व सिंचाई में छह-सात हजार रुपये खर्च हो गए हैं। अब कैसे खर्च पूरे होंगे, यहीं चिंता है।
अधूरे हुए विटिया की शादी के अरमान - 20 हजार में बलकट पर ली खेती, 10 हजार लागत, बेमौसम बारिश से 30 हजार रुपये मिट्टी में मिल गए हैं। सोचा था दो लड़का व तीन बेटियों में पहली बेटी के हाथ पीले करेंगे, यह भी अरमान अधूरा रह गया है।