स्वतंत्रता संग्राम सेनानी प्रभुदयाल।
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औरैया। ऐरवाकटरा के प्रभु दयाल ने वर्ष 1921 में असहयोग आंदोलन में क्षेत्रीय युवाओं को एकजुट किया। आंदोलन में उनकी अग्रणी भूमिका के कारण अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें गिरफ्तार कर यातनाएं दी। इसके बावजूद उनके सीने में धधक रही आजादी की आग मंद नहीं पड़ी और वह भारत माता को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने को आगे बढ़ते गए।
भारत प्रेरणा मंच के महासचिव पूर्व सैनिक अविनाश अग्निहोत्री बताते हैं कि ब्लाक ऐरवाकटरा की ग्राम सभा एरवाटिकुर में वैश्य परिवार में 1886 में जन्में प्रभुदयाल ने महात्मा गांधी का अनुयायी बन तहसील बिधूना के ग्रामीण क्षेत्रों में पैदल घूम-घूम कर स्वतंत्रता की अलख जगाई। इस बीच आजादी की लड़ाई की पृष्ठभूमि तैयार हो चुकी थी। संपूर्ण देश गांधी के नेतृत्व में खड़ा था। सन 1921 के असहयोग आंदोलन में तहसील बिधूना में सैकड़ों साथियों को तैयार किया। इस आंदोलन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
माह सितंबर 1921 में ब्रिटिश शासन ने उनको गिरफ्तार कर एरवाकटरा थाने में यातनाएं दी। इसके बाद उनको केंद्रीय कारागार फतेहगढ़ भेज दिया गया। 28 सितंबर 1921 को एक वर्ष की कैद हुई। सजा काट कर वापस आए तब और अधिक उत्साह के साथ स्वतंत्रता आंदोलन को समर्पित हो गए। स्वतंत्रता उनका महान आशय था। इसलिए आम जनता उनको महाशय प्रभु दयाल के नाम से जानने लगी।
घर-परिवार, पिता-पुत्र, नाते-रिश्ते सभी को त्याग कर आजादी को समर्पित हो गए। वर्ष 1921, 1922 व 1942 आदि सभी आंदोलनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। देश आजाद होने के बाद वर्ष 1973 में फर्रुखाबाद के स्वामी परमानंद आर्य सन्यासी द्वारा सन्यास ग्रहण कर विधिवत सन्यास आश्रम में प्रवेश किया। महाशय प्रभु दयाल से प्रभु दयाल वानप्रस्थ बने। बाद में स्वामी प्रेमानंद बने। संपूर्ण जीवन खद्दर पहनना, चरखा चलाना, सादा जीवन उच्च विचार का एक आदर्श जीवन लक्ष्य की पूर्ति करते हुए 97 वर्ष की आयु में स्वर्गवासी हो गए। उनकी अंत्येष्टि राजकीय सम्मान के साथ हुई। आज भी लोग उनके आंदोलन की चर्चाएं करते हैं।